30 अप्रैल 2026
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया
दिल्ली ! देश की राजधानी। इसकी लाखों कहानी । एक दिल्ली में अनेक दिल्ली है। हवाई अड्डे से निकल कर कुलीन क्षेत्र की एक दिल्ली है। लुटियंस जोन में एक दिल्ली है। झुग्गी झोपड़ियों में एक अलग दिल्ली। रेलवे स्टेशन पर एक अलग दिल्ली। और प्रेस क्लब में एक अलग दिल्ली..!
खैर, बड़े भाई पवन भैया के सानिध्य में प्रेस क्लब जाना हुआ। पहली बार कई चीजों को देखा। एक अलग अनुभूति हुई। जैसे देश की राजधानी के इस हृदयस्थली में देश, विदेश की चिंताओं में उलझते हुए भी घूंट घूंट में चिंता मुक्त होने के कौशल में सभी सिद्धहस्त ..!
अब इस विवरण से इतर, पवन भैया की पुरानी यादें। वर्ष 2005–06 । युवावस्था में पत्रकारिता का जुनून। शिवकुमार दा से पता चला, दिल्ली में जी न्यूज में एक बड़े पत्रकार है, पवन जी। बड़े अच्छे आदमी है। फिर क्या। टीवी का क्रेज उस समय चरमोत्कर्ष पर था। सो। पता लेकर दिल्ली भाग गया। नोएडा फिल्म सीटी। उस समय बसाया जा रहा था। और मुझे कुछ ज्ञान भी नहीं। खैर, पवन भैया से टेलीफोन पर मिले निर्देश का पालन करते हुए बस की सवारी कर नोएडा के आसपास हाई वे पर बस वाले ने उतार दिया। फिर क्या, उमंग चरम। तपती धूप हाई वे नीचे उतरा। फिसल कर गिर पड़ा। दूर दूर तक कोई नहीं था। किसी ने नहीं देखा। संतोष हुआ। पूछते–पछाते पहुंच गया। गार्ड साहब को बताया। वे मैसेज लेकर गए। पवन भैया को पहली बार देखा तो एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ। अरे, ये तो कोई ब्रिटिश है। ये बिहार के कैसे हो सकते हैं!
खैर, यह भरम तुरंत टूट गया।
"की हाल हो। एत्ते दूर कन्ने आ गेलहो। चलो पहले चाय पी ले जाय।"
मगही में एक खनकती हुई आवाज कानों में गूंज उठा तो भरोसा ही नहीं हुआ। यह अत्याधुनिक , प्रभावशाली व्यक्तित्व और यह मगही बोली..! टुकुर टुकुर देखने लगा। साथ चल दिए। जी न्यूज के ऑफ़िस के आगे चारों ओर खेत ही खेत थे। एक चारदीवारी के ऊपर प्लास्टिक देकर एक चाय दुकान चल रही थी। करीब आधा दर्जन लोग सिगरेट के धुएं के साथ चाय की चुस्की ले रहे थे। कोयले के चूल्हे पर चाय खौल रहा था और उसी अनुपात में कई लोगों का मन भी। खौलते हुए मन से लोग कांग्रेस पर उबाल ले रहे थे। मैं समझ गया। सभी पत्रकार ही होंगे..!
खैर, चाय पी । फिर बातचीत हुआ। अपनी इच्छा बता दी।
"टीवी में रिपोर्टर बनना चाहते हैं।"
तब पवन भैया ने बताया कि वे जी बिजनेस में है। फिर भी में मुख्य न्यूज ग्रुप में प्रयास करेंगे।
खैर, वहां से लौट आया। तब से संपर्क बना हुआ है। एक यायावर है पवन भैया, इतना ही।
आज पुनः दिल्ली में था। पवन भैया ने प्रेस क्लब बुलाया। मैं पहले पहुंच गया। रिसेप्शन पर बात किया। पहले से निर्देश था। मैं अंदर चला गया।
गांव के रिपोर्टर के लिए प्रेस क्लब तीर्थ जैसा है।
शाम ढल गई थी। प्रेस क्लब के खुले आकाश में पेड़ के नीचे कई टेबल लगे थे। लोग वहां ठीक वैसे ही आ रहे थे जैसे गोधूली की बेला में चरवाहे गाय के गले की घंटी की टुनुर टुनुर आवाज के साथ कंधे पर लाठी रख कर उसी के ऊपर दोनों हाथ रख, झूमता घर जा रहा हो। हां, एक अलग बात यह कि कई चेहरे ऐसे मुरझाए थे, जैसे शाम में सूरजमुखी का फूल।
खैर, पवन भैया आए । इनके साथ भी एक व्यक्ति थे। परिचय कराया। प्रभात जी है। बेगूसराय के ।
फिर टेबल पर बैठे।
"मांस, मछली खा हो..?"
"नहीं.." मैने गर्दन डुलाया।
पनीर पकौड़ा, आलू पकौड़ा इत्यादि आ गया।
और फिर
"दारू पीओ हो..."
"नहीं..."
"दुर्र महराज। तों कौन आदमी हा...प्रभाते नियर !"
फिर वे अपने लिए व्हिस्की का ऑर्डर दिए। प्रभात जी और मेरे लिए नींबू शेक।
शिप शिप कर चलने लगा। इस बीच कई लोगों से उन्होंने मेरा परिचय कराया।
खैर, प्रेस क्लब में नए अनुभव कई हुए। पहला तो यह कि इतनी सज्जनता शराब पिए हुए आदमी को पहली बार देख रहा था। एक दम शांति से।
और पहली बार सिनेमा के पर्दे से बाहर सिगरेट के धुएं का छल्ला बना कर बेफिक्र से उड़ाती हुई स्त्री को आँखें मूंद कर शराब की घूंट को गले में उतारता हुआ भी कौतूहल बस, बार बार मुड़ मुड़ कर देख रहा था। फिर दो दिन पवन भैया के यहां रुके..बाकी फिर कभी... बस..
22 अप्रैल 2026
मतलब निकल गया तो...
मतलब निकल गया तो...
महानगरीय संस्कृति में कुछ ज्यादा और वर्तमान मानवीय व्यवहार में कुछ कुछ, कहीं कहीं, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, चलन में है।
अब पशुओं पर भी यह मानवीय अत्याचार आम है। वह भी उस पालतू के साथ, जिसने आदमी को अपना सबकुछ मान लिया। पालतू कुत्ता के साथ। दिल्ली सहित, महानगरों में यह आम है। कुत्ता को आवारा छोड़ देते हैं। कल दिल्ली के एक पॉश क्षेत्र में यह बहुत दिखा। दुख हुआ।
खैर, उसके कई कारण हो सकते है, जैसे घर, शहर बदलना, कुत्ता का काट लेना.. कुत्ता का बीमार होना, आदि इत्यादि..। तब क्या, हम जिससे प्यार करते हैं, उसे किसी भी कारण से छोड़ देना मानवता तो नहीं है..?
वह भी तब, पालतू कुत्ता अपने पालने वालों के हर खुशी का ध्यान रखता है। उसे अपना मालिक ही सबकुछ लगता है। घर आने पर वह खुशी कोई अपना भी रोज रोज नहीं दे सकता, यह देता है। घर आने का इंतजार, दरवाजे को ताकते रहना, घर आते है नितराने (झूमने) लगना। आदि, इत्यादि। पर इसे दूर से कोई समझ नहीं सकता। प्रेम करके ही प्रेम को जाना जा सकता है।
इसीलिए निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,
"होश वालों को खबर क्या,
बेखुदी क्या चीज है..."
एक निवेदन, शौक के लिए कुत्ता मत पाला करिए। किसी के कहने से भी मत पालिए। मनोरंजन के लिए मत पालिए। कुत्ता पालना एक बड़ी जिम्मेवारी है। परिवार का एक सदस्य बढ़ जाता। और परिवार के सदस्य की देखभाल , प्यार सब कुछ देना पड़ता है। वही फिर लौट कर मिलता है।
बाकी, पालतू कुत्ते को सड़क पर छोड़ने का पाप, महा पाप है। और कुछ को देखा है, पालतू को सड़क पर छोड़ तो देते है, इसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आप नजर उठा कर देखिए, आसपास...!
इसलिए तो कबीरदास ने कहा है,
"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।
बिना जीव की साँस से, लोह भसम हो जाय॥"
21 अप्रैल 2026
दिल्ली में हूं...
दिल्ली में हूं...
(यात्रा वृतांत)
सोमवार को दिल्ली आना हुआ। कल तक के लिए। दिल्ली पहले भी आना हुआ। बीच में कई बार आया। अब दिल्ली बहुत कुछ बदल गया। आज पुरानी बातें याद आ गई।
पहले, शायद 1995 या 96 में पहली बार व्यापार के लिए आया था। पता चला था कि सदर बाजार में स्टेशनरी इत्यादि सामान सस्ता मिलता है। एक सहपाठी वहीं, एक दुकान में काम करता था। आया तो, यादें याद आ गई है।
एक छोटी झलक। जेनरल टिकट से यात्रा कर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद रिक्शे वाले से पूछा तो अनजान समझ कर अनाप शनाप पैसे मांगने लगा। एक एक पैसा कमाना, एक एक पैसा बचाना।
तब किसी से पूछा, सदर बाजार किधर और कितना दूर है। उसने बताया। मैं पैदल चल दिया। रास्ते में देखा सड़क के किनारे कई महिला, लड़कियां सज संवर कर खड़ी है। वे पुरुषों को इशारे से बुला रही। गांव का एक युवा को यह बेहद चौंकाने वाला लगा। फिर देखा, कुछ को तो बांह पकड़ कर लड़िकयां साथ लेकर चली गई।
मैं डर गया। सड़क के दूसरे किनारे से सहमा सहमा जाने लगा। सड़क के दूसरे किनारे से एक महिला ने गंदा इशारा किया और गंदी गाली दी। मैं नजरअंदाज करके तेज कदमों से आगे बढ़ता चला गया। और सड़क पार कर गया।
पूछता पूछता , सदर बाजार पहुंचा। आज भी याद है। रामअतर सिंह, स्वरूप सिंह की दुकान। बेल्ट, बैग इत्यादि । उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था।
मेरा सहपाठी संजय राम, वहीं स्टाफ था। देखा कि उसके साथ भी बहुत अपने जैसा व्यवहार था। मुझे अच्छा लगा।
अब दिल्ली में मैट्रो है। कैब है। बाइक है। रिक्शा नहीं...
भीषण गर्मी में पहले भी दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी, या कम, आज भी वही। आज भी 2 रुपए गिलास पानी बिकता है। कल भी।
छोला बटुरा पहली बार दिल्ली में खाया था। तब से जब दिल्ली आया जरूर खाता। अब नहीं।
और हां, तब संजय राम के यहां ही ठहरा था। पहाडगांव में।
खूब आनंददायक। मोटा मोटा रोटी, और सब्जी बनाकर खिलाता था। जमीन पर गेंद्रा बिछा कर सो जाना। और भोर...! बस, आगे फिर कभी...
बाकी दिल्ली के कुछ अपनों से बिना वजह मिलने का प्रयास कर रहा... पर डर लगता है कि यहां के भाग दौर की जिंदगी में किसी को परेशान करना भी ठीक नहीं...
बाकी सब ठीक है...
03 अप्रैल 2026
बेटा (लघु कथा)
बेटा
(अरुण साथी की लघु कथा)
रामदेव । आजीविका चलाने के लिए वह अपनी जवानी हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव में गार्ड की नौकरी करते बीता दिया।
इसी बीच उसका इकलौते बेटा आर्मी का जवान बन गया। घूमघाम से शादी की। उम्र के ढलान पर वह गांव आ गया।
समय बीता। उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। घर चलाने का खर्च जैसे तैसे चलने लगा। रामदेव की पत्नी भी ज्यादातर बीमार रहती।
रामदेव ने बेटा से कभी कोई पैसे की मांग नहीं रखी। बेटा कभी कभी पत्नी के खाता पर कुछ पैसे भेज देता, जिससे गुजारा होना मुश्किल था।
एक दिन पत्नी के समझाने पर रामदेव में बेटा से बात की।
"बेटा, घर चलाना मुश्किल होता है। तुम्हारी मां भी बीमार है। इस माह पांच हजार भेज देता तो राहत होती।"
बेटा ने तपाक से उत्तर दिया।
"पिताजी, 50 हजार वेतन है। एक पैसा नहीं बचता। बच्चे की पढ़ाई। घर का किराया। घर चलाने का खर्च। कई तरह का ईएमआई।"
रामदेव चुप हो गया। पर उसके अंदर कुछ टीस रहा था। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी हाथी ने अपना पांव रख दिया हो।
वह अतीत में खो गया। उसका वेतन नौ हजार महीना था। बेटा को पटना में तैयारी कराया। हर महीना 5 से 7 हजार खर्च था। किसी किसी महीना तो 10 हजार। पर उसने कभी सोचा तक नहीं। और आज उसे यह जवाब मिला...रामदेव ने डबडबाई आंखों से पत्नी की तरह देखा, उसकी भी आंखों में आंसू थे...!
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