रात्रि में जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, एक भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक समाती चली गई।
एक बारगी चौंक गया। अरे, अभी तो हरसिंगार, रात की रानी इत्यादि में फूल भी नहीं हैं, फिर यह मीठी सुगंध कहाँ से...!
सर उठाया तो मधु मालती, गुलाबी और सफेद पंखुड़ी रूपी आँचल के पीछे से मुस्कुरा रही थी। तब भी मैं इधर-उधर देखने लगा, शायद कोई फूल खिला हो... पर कोई नहीं था।
फिर नासिका को मधु मालती के पास ले गया। अरे, सच में यह तो इसी की सुगंध है...! पहली बार यह जाना। मधु मालती भी इतनी भीनी सुगंध बिखेरती है।
पहली बार इसलिए, क्योंकि आज से पहले इसे गाँव में जंगल-झाड़ में उगा हुआ, खिला हुआ देखता रहा। घर में भी रही तो दृष्टि नहीं पड़ी।
क्योंकि इसे सर्वहारा ही मानता था। पर आज इसे अभिजात्य वर्ग जैसा पाकर विश्वास नहीं हुआ.. आज माना, सुगंध और सौंदर्य सर्वहारा और अभिजात्य में विभेद नहीं करते...