20 मई 2026
देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी
देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी
रावणेश्वर महादेव की नगरी देवघर यात्रा पर अचानक जाना हुआ। बाबा नगरी 1993 से कई बार पैदल जाना हुआ। एक बार डाक बम भी गया। इतने सालों बाद, अब बहुत कुछ बदल गया। पर बहुत कुछ नहीं बदला है।
सबसे बड़ा बदलाव शराब का है। दरअसल बिहार में शराबबंदी है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग समूह में शराब पीने देवघर जाते है। इसका असर भी दिखा। दरअसल , हमलोग साथियों से साथ शनिवार की शाम गए और रविवार को लौटने की योजना थी। पर वहां पहुंचने पर होटल में कमरा थोड़ा मुश्किल से मिला।
कारण, शराब। स्थानीय लोगों ने बताया कि बिहार से बड़ी संख्या में लोग शनिवार को शराब पीने आते हैं।
रविवार को रहते है। सोमवार को पूजा करके लौटते है। यह हाल है।
अपने पंडा जी उदय शंकर (दोरंगी पंडा) जी ने भी नकारात्मक अनुभव दिया। बताया कि उनके होटल में बरबीघा के कई लोग शराब पीकर हंगामा कर चुके है।
खैर, हम लोगों को एक होटल मिला। शाम में मंदिर गया।
वही पुरानी और टूटी फूटी सड़कें। गंदगी, बदबू ..! संकरी गलियां।
शाम में एक नया अनुभव मिला। वहां लाइव कथक नृत्य और गायन समारोह चल रहा था। अभिभूत करने वाला। देर तक आनंद लिया। पता चला कि देवघर के बड़े कथक नृत्य विद्यालय चलने वाले संजय परिहस्त जी गुरु है। उनके समूह की बच्चियों ने अति उत्कृष्ट कथक की प्रस्तुति दी। मैने गुरु जी को इस महान कार्य के लिए जाकर प्रणाम किया।
अगले दिन रविवार। 6 बजे मंदिर पहुंचे। पता चला भारी भीड़ है। पंडा जी शीघ्र दर्शनम का कूपन लाकर दिए और बोले कि इसमें मेरा भी कमीशन रहता है। तब भी तीन घंटे लगे।
नहीं बदला तो वहीं पंडा का धन लोभ। मुख्य दरवाजे से पहले एक महोदय बस के कंडक्टर की तरह हर प्रवेश करने वाले से नोट बसूल कर उंगली में फंसा के रख रहे थे और तभी आशीर्वाद दे रहे थे। मैने नहीं दिया। आशीर्वाद नहीं..!
खैर, अंदर प्रवेश करते ही दिव्य आभा और ओज का आलिंगन। अपने गुरु और आराध्य भोलेनाथ पर जल अर्पित किया। वहां भी नोट देख कर भगवान को आराम से छूने की व्यवस्था। नहीं देने वाले को किनारे से हटाया जाता।
अभी अचानक से एक घटना घटी। एक पंडा जी ने पीठ पर हाथ मारा, आशीर्वाद दिया और सिर में शिव लिंग से उठाकर एक माला डाल दी। फिर बड़े सद्भाव से बोले दक्षिणा, मैं भी स्वतःस्फूर्त एक छोटा सा सहगोग कर दिया। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। क्योंकि आज तक मैने ऐसा नहीं किया था। खैर, शिव की मर्जी, शिव ही जाने...
16 मई 2026
पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज
पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज
यह पालकी है। बहुत पुरानी पीढ़ी को इसका अनुभव होगा। मुझे भी थोड़ा अनुभव है। 1983 में। मैं 10 वर्ष का था। लखीसराय के नंदनामा से जमुई के घोंघसा बारात गई थी। मुकेश दा दूल्हा थे। मैं सहवाला (दूल्हा से साथ एक छोटा बच्चा रहता है) । दुआर लगने के लिए पालकी से गया था।
खैर , शायद पहले जमींदार भी पालकी से जाते थे। गांव की नई बहु भी पालकी पर आती, जाती थी।
जमींदार को लेकर बरबीघा का अनुभव लिखते हुए दिनकर जी लिखते है,
" तेउस गांव के जमींदार दोहरा जीवन जीने के आदि थे। गांव से बाहर आने के लिए वे पालकी से निकलते थे और गांव के बाहर निकल कर वे पैदल जाते थे..!"
खैर, अभी डीजल, पेट्रोल बचाने का आह्वान और फोटो सेशन चल रहा है। वैसे में हाल में ही बरबीघा के पांक गांव में यह चित्र लिया था। दूल्हे को ले जाने के लिए पालकी कहीं कहीं आज भी यह चलन में है। अब लगता है पुराने दिनों लौटना होगा। पहले हम स्वाबलंबी थे। आज नहीं...
14 मई 2026
जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..
जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..
रात्रि में जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, एक भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक समाती चली गई।
एक बारगी चौंक गया। अरे, अभी तो हरसिंगार, रात की रानी इत्यादि में फूल भी नहीं हैं, फिर यह मीठी सुगंध कहाँ से...!
सर उठाया तो मधु मालती, गुलाबी और सफेद पंखुड़ी रूपी आँचल के पीछे से मुस्कुरा रही थी। तब भी मैं इधर-उधर देखने लगा, शायद कोई फूल खिला हो... पर कोई नहीं था।
फिर नासिका को मधु मालती के पास ले गया। अरे, सच में यह तो इसी की सुगंध है...! पहली बार यह जाना। मधु मालती भी इतनी भीनी सुगंध बिखेरती है।
पहली बार इसलिए, क्योंकि आज से पहले इसे गाँव में जंगल-झाड़ में उगा हुआ, खिला हुआ देखता रहा। घर में भी रही तो दृष्टि नहीं पड़ी।
क्योंकि इसे सर्वहारा ही मानता था। पर आज इसे अभिजात्य वर्ग जैसा पाकर विश्वास नहीं हुआ.. आज माना, सुगंध और सौंदर्य सर्वहारा और अभिजात्य में विभेद नहीं करते...
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