21 अप्रैल 2026

दिल्ली में हूं...

दिल्ली में हूं...  

(यात्रा वृतांत)

सोमवार को दिल्ली आना हुआ। कल तक के लिए। दिल्ली पहले भी आना हुआ। बीच में कई बार आया। अब दिल्ली बहुत कुछ बदल गया। आज पुरानी बातें याद आ गई।
पहले, शायद 1995 या 96 में पहली बार व्यापार के लिए आया था। पता चला था कि सदर बाजार में स्टेशनरी इत्यादि सामान सस्ता मिलता है। एक सहपाठी वहीं, एक दुकान में काम करता था। आया तो, यादें याद आ गई है।
एक छोटी झलक। जेनरल टिकट से यात्रा कर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद रिक्शे वाले से पूछा तो अनजान समझ कर अनाप शनाप पैसे मांगने लगा। एक एक पैसा कमाना, एक एक पैसा बचाना। 
तब  किसी से पूछा, सदर बाजार किधर और कितना दूर है। उसने बताया। मैं पैदल चल दिया। रास्ते में देखा सड़क के किनारे कई महिला, लड़कियां सज संवर कर खड़ी है। वे पुरुषों को इशारे से बुला रही। गांव का एक युवा को यह बेहद चौंकाने वाला लगा। फिर देखा, कुछ को तो बांह पकड़ कर लड़िकयां साथ लेकर चली गई। 

मैं डर गया। सड़क के दूसरे किनारे से सहमा सहमा जाने लगा। सड़क के दूसरे किनारे से एक महिला ने गंदा इशारा किया और गंदी गाली दी। मैं नजरअंदाज करके तेज कदमों से आगे बढ़ता चला गया। और सड़क पार कर गया। 

पूछता पूछता , सदर बाजार पहुंचा। आज भी याद है। रामअतर सिंह, स्वरूप सिंह की दुकान। बेल्ट, बैग इत्यादि । उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था। 

मेरा सहपाठी संजय राम, वहीं स्टाफ था। देखा कि उसके साथ भी बहुत अपने जैसा व्यवहार था। मुझे अच्छा लगा। 

अब दिल्ली में मैट्रो है। कैब है। बाइक है। रिक्शा नहीं...

भीषण गर्मी में पहले भी दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी, या कम, आज भी वही। आज भी 2 रुपए गिलास पानी बिकता है। कल भी। 

छोला बटुरा पहली बार दिल्ली में खाया था। तब से जब दिल्ली आया जरूर खाता। अब नहीं। 

और हां, तब संजय राम के यहां ही ठहरा था। पहाडगांव में। 

खूब आनंददायक। मोटा मोटा रोटी, और सब्जी बनाकर खिलाता था। जमीन पर गेंद्रा बिछा कर सो जाना। और भोर...! बस, आगे फिर कभी... 


बाकी दिल्ली के कुछ अपनों से बिना वजह मिलने का प्रयास कर रहा... पर डर लगता है कि यहां के भाग दौर की जिंदगी में किसी को परेशान करना भी ठीक नहीं...


बाकी सब ठीक है...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें