बेटा
(अरुण साथी की लघु कथा)
रामदेव । आजीविका चलाने के लिए वह अपनी जवानी हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव में गार्ड की नौकरी करते बीता दिया।
इसी बीच उसका इकलौते बेटा आर्मी का जवान बन गया। घूमघाम से शादी की। उम्र के ढलान पर वह गांव आ गया।
समय बीता। उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। घर चलाने का खर्च जैसे तैसे चलने लगा। रामदेव की पत्नी भी ज्यादातर बीमार रहती।
रामदेव ने बेटा से कभी कोई पैसे की मांग नहीं रखी। बेटा कभी कभी पत्नी के खाता पर कुछ पैसे भेज देता, जिससे गुजारा होना मुश्किल था।
एक दिन पत्नी के समझाने पर रामदेव में बेटा से बात की।
"बेटा, घर चलाना मुश्किल होता है। तुम्हारी मां भी बीमार है। इस माह पांच हजार भेज देता तो राहत होती।"
बेटा ने तपाक से उत्तर दिया।
"पिताजी, 50 हजार वेतन है। एक पैसा नहीं बचता। बच्चे की पढ़ाई। घर का किराया। घर चलाने का खर्च। कई तरह का ईएमआई।"
रामदेव चुप हो गया। पर उसके अंदर कुछ टीस रहा था। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी हाथी ने अपना पांव रख दिया हो।
वह अतीत में खो गया। उसका वेतन नौ हजार महीना था। बेटा को पटना में तैयारी कराया। हर महीना 5 से 7 हजार खर्च था। किसी किसी महीना तो 10 हजार। पर उसने कभी सोचा तक नहीं। और आज उसे यह जवाब मिला...रामदेव ने डबडबाई आंखों से पत्नी की तरह देखा, उसकी भी आंखों में आंसू थे...!
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