18 मार्च 2022

उसना चावल का कम होता चलन

#उसना_चावल #ब्राउन_राइस 


ब्राउन राइस के बारे में बहुत जानकारी मुझे नहीं है । गूगल करने पर भी स्पष्ट जानकारी कहीं नहीं है। अपने यहां  उसना (देहाती-उसरा) चावल खाने की परंपरा रही है। उसना चावल बनाना काफी कठिन काम है ।
धान को चूल्हे पर दो बार उबाला जाता है फिर उसे सुखाने के बाद मिल में चावल अलग किया जाता है। इसका रंग भी ब्राउन होता है। हो सकता है इसे ही ब्राउन रईस कहते हों । सुना है कि ब्राउन राइस खाने का चलन महानगरों में बढ़ रहे हैं परंतु गांव में अब उसना चावल खाने वाले लोग कम हो गए हैं।
 घरों में उसना चावल बनाने के लिए महिलाओं को काफी मशक्कत करनी पड़ती है । ऐसे में धीरे-धीरे किसान उसना चावल नहीं बनाते हैं । धान को बेच लेते हैं। बाजार से पॉलिस चावल खरीद कर खाते हैं। अरवा चावल खाने का प्रचलन इधर नहीं है।

 खैर हर साल की तरह गृह मंत्री के कई बार स्पष्टीकरण ( #हुरकुच्चा) के बाद उनके परिश्रम से उसना चावल को मिल से पिता-पुत्र मिलकर चावल बना कर घर ले आये। होली अपने यहां एक दिन बाद है तो छुट्टी का सदुपयोग भी हो गया।

29 जनवरी 2022

यात्रा वृतांत: काशी कॉरिडोर और योगी मोदी

काशी कॉरिडोर 

अंदर मोबाइल कैमरा ले जाने की मनाही है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास पूजा सामग्री विक्रेता दुकानदार अन्य जगहों के पूजन सामग्री बिक्री के दुकानदारों की तरह ही थे। धर्म के प्रखर धंधेबाज। या कहिये बसूलीबाज।

 भारी-भरकम झोला देखा नहीं की पूजन सामग्री की कीमत दोगुना कर देते हैं। सभी के एजेंट चेहरे पढ़ने में माहिर होते हैं । तो उनके भी एजेंट ने चेहरा पढ़ लिया। दुकान में बहुत इज्जत के साथ बैठाया। बैग रखवाया। जूते खुलवाए। खूब सम्मान से बात की।

 इस सबके बाद लाकर में मोबाइल बैग इत्यादि रख दिया।  बस 2 मिनट के बाद ही चेहरे के हाव-भाव और तेवर बदल गए। एक टोकरी प्रसाद हाथ में थमा या और 501 का है। दोनों प्राणी के हाथ में दो टोकरी । दोनों हक्का-बक्का । जरा सा मुकुंदाना, एक गेंदा फूल का माला, यही सब। ऊपर से एक ₹10 वाला प्लास्टिक के मोतियों का माला।
मैंने कहा भैया यह तो बहुत मंहगी है। तो क्या, लेना तो पड़ेगा। प्रसाद के बिना पूजा कैसे। मैंने कहा कि थोड़ी थोड़ी सस्ती वाली दे दो। फिर मोतियों की माला निकाल लिया। और ₹200 कीमत कम हो गया। आंखें लाल पीली कर ली। जैसे निगल ही जाएगा। मन ही मन कह रहा हो। जैसे औकात नहीं तो क्यों आ जाते हो काशी।
 बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद लेने। बहुत हुज्जत के बाद 251 की एक टोकरी कीमत तय हुई । फिर मंदिर में प्रवेश के लिए गया। सुरक्षा के काफी सख्त इंतजाम। भीड़ बहुत कम । अंदर प्रवेश करने के बाद कुछ ही देर लाइन में लगने पर बाबा विश्वनाथ के दर्शन हुए। जल चढ़ाया। फिर काशी कॉरिडोर की नक्काशी, कलाकारी, सौंदर्य देखने में लग गया।


 इस सब देखने के बाद कुछ देर के लिए ध्यान में वही बैठ गया। शांतिपूर्ण अनुभूति। निकलने से पूर्व एक पर्यटकों की टोली आई। आपस में बातचीत के दौरान वे लोग बोल रहे थे । पहले के समय में जो काम राजा महाराजा करते थे। वही काम मोदी योगी कर रहे हैं। इससे बेहतर क्या हो सकता है। वही एक जानकार ने बताया कि पहले सौ-दो सौ लोगों को ही परेशानी होती है। अब पांच हजार लोग यहां आराम से आ सकते हैं।

मैं पर्यटकों के बीच कुछ देर के लिए बैठा। लोग आपस में बातचीत कर रहे थे कि कैसे मुगल आक्रांताओं ने मंदिर को कई बार तोड़ दिया। नामोनिशान मिटाया । फिर राजा महाराजा अपने स्तर से मंदिर का निर्माण करवाए। मंदिर के ऊपरी भाग पर सोने के लिए पतर काफी आकर्षक दिख रहे थे। बगल को ज्ञानबापी मस्जिद भी बहुत कुछ कह रही थी।





27 जनवरी 2022

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा 

अरुण साथी

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह तस्वीर देख रहे हैं। वर्तमान धार्मिक राजनीतिक हस्तक्षेप और धार्मिकता का प्रतीक भी आप मान सकते हैं । चेहरे पर चमकीले रंग लगाकर भगवान की आकृति बच्चों ने उकेरी है परंतु इसकी फटेहाली इसके अंदर के कपड़ों में आप देख सकते हैं। हालांकि कई लोग बच्चों के साथ सेल्फी ले रहे थे । इसके एवज में बच्चे पैसे भी ले रहे थे।
 मैंने फोटो खींच ली। बच्चे लटक गए। फोटो खींचे हैं। तो पैसा लगेगा। फ्री में फोटो खींचने नहीं देंगे। बहुत बच्चे जिद करने लगे।

 मैं सोचने लगा। यह तो अबोध बच्चे हैं। जब राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भगवान को बेच रहे हैं तो बच्चे अगर ऐसा कर रहे हैं तो कौन सा पाप है। देश का यही हाल है। हमारा, आपका, सबका। कोई खरीदार है। तो कोई दुकानदार। धर्म का धंधा चोखा चल रहा है।

#भगवा का #जलवा #काशी

#काशी में #भगवाधारी #बाबा ने अचानक से कल्याण हो कह दिया। उत्कंठा जगी। सहयोग राशि बढ़ा दी। अमूमन मैं ऐसा नहीं करता। लाचार और कमजोर की सेवा कर देता हूं । पर ऐसे लोगों का नहीं। फिर भी..

 तभी वहां दूसरे भगवाधारी भी पहुंच गए और खुद के लिए भी मांग करने लगे। मैंने इग्नोर किया तो भड़क गए । ऐसे भड़के जैसे उनका कर्जा रखा हुआ हो। फिर बहस हुई और इसी बात के बीच एक वृद्ध बुजुर्ग #भिखारी भी कूद पड़े और उसे लताड़ लगाने लगे। जबरदस्ती क्यों करते हो। दान खुशी की चीज है। 

मुझसे बोलने लगे

वस्त्र - वस्त्र का अंतर है साहब । यह लोग भगवा पहन कर हम लोगों से भी गए बीते हैं। हम लोग कभी जबरदस्ती नहीं करते परंतु इन लोगों के द्वारा कई लोगों से बहुत बदतमीजी की जाती है। परंतु हम लोग ही तिरस्कार पाते हैं। नाम पता पूछने पर जौनपुर निवासी #बांकेलाल बताया।



04 जनवरी 2022

समाजवादी इत्र

समाजवादी इत्र 

 यह तो जुलुम है भाई ! अब ऐसे लोगों को थर्ड डिग्री ना दे कोई तो क्या करें...? देश से लेकर प्रदेश तक उनका कहर (सॉरी लहर) है और इत्र कारोबारी ने समाजवादी इत्र लांच कर सीधा मुंह पर तमाचा जड़ दिया।

 भाई देखा नहीं कि कैसे अधर्म संसद में एक असंत ने महात्मा को भरे मंच से गाली दी। श्रोताओं ने ताली दी। जैसा कि होना था। बहादुर चुप । तो समझ लेना था कि वर्तमान में महात्मा के अनुयाई नहीं जो एक गाल पर थप्पड़ लगे तो दूसरा गाल आगे कर दे।

 यहां फंडा क्लियर है। ऐसे में किसी कारोबारी की खुल्लम-खुल्ला चुनौती बर्दाश्त से बाहर है। सो आईटी-ईडी नामक विरोधी संघरक यंत्र का प्रयोग मजबूरी में करना पड़ा। अब रोने से क्या फायदा। पहले सोचना चाहिए था।

01 जनवरी 2022

नव वर्ष का सरकारी जूता उपहार

नव वर्ष का सरकारी जूता उपहार

 
अरुण साथी

नव वर्ष पर सरकार ने लोगों के सेहत का ध्यान रखते हुए उपहार दिया है। सरकार ने जूते मंहगे कर दिए हैं। यह एक दूरगामी फैसला है। महंगाई बढ़ाओ भक्तजन संघर्ष समिति की  बहुसदस्य सदस्यों ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी।  कहा गया कि राम का नाम लेकर देश में पेट्रोल महंगा हुआ। डीजल पेट्रोल से कंधा से कंधा मिलाकर पहली बार चल रहा है। यह समतामूलक समाज के निर्माण में एक सर्वश्रेष्ठ कदम है। इसी के साथ रसोई गैस को दोगुना महंगा करके सरकार ने लोगों को अपने पैसे में खुद आग लगाने से रोकने की एक सराहनीय पहल की है। इसका शुभ प्रभाव पड़ा है। अनाज, बिस्कुट, सीमेंट आदि-अनादि वस्तुएं महंगी हुई है।
अच्छे दिन वाली सरकार है आई, कमर जोड़ महंगाई लाई। मजबूत देश के लिए मजबूत कमर का होना जरूरी है। देश की सभ्यता, संस्कृति से लोगों को जोड़ने और उनके सेहत का ख्याल रखने के लिए महंगाई आवश्यक है। लोगों के लिए पैदल चलना, गोबर-गोईठा से खाना बनाना, बैलगाड़ी का प्रयोग करना भारतीय सभ्यता, संस्कृति रही है। इसे पुनर्स्थापित करने के लिए वर्तमान सरकार कृत संकल्पित है।


देश और सभ्यता संस्कृति विरोधी ताकतें सर उठा रही है। ऐसी ताकतें जूता चलाओ आंदोलन शुरू कर सकती है। खुफिया विभाग ने भी यह रिपोर्ट सौंपी है। सरकार ने आनन-फानन में जूता पर जीएसटी बढ़ाकर उसे महंगा करने का निर्णय लिया। अब लोग पैदल चलेंगे तो स्वास्थ्य बढ़िया होगा। वैसे भी आदिम युग में पैदल ही लोग चलते थे। हमारी सभ्यता में जूता पहनने की परंपरा नहीं रही है। यह पाश्चात बीमारी है। पैदल चलना एक्यूप्रेशर का काम भी करता है। कई बीमारियों को दूर भगाता है। ना रहेगा जूता, ना चलेगा जूता। जय श्री राम। नव वर्ष मंगलमय हो।

18 दिसंबर 2021

बलात्कार का आनंद लेता पितृसत्तात्मक समाज

कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस विधायक ने जब बलात्कार रोक नहीं सकती तो उसका आनंद लो जैसे घृणास्पद और नीचतापूर्ण बात कही तो यह पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता का जयघोष ही था। यदि ऐसा नहीं होता तो उस विधानसभा के माननीय अध्यक्ष के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं होती। और उसी विधानसभा में बैठे सभी माननीयों के ठहाके नहीं गूंजते।


ऐसे घृणास्पद कथनों के बाद नीचतापूर्ण राजनीति भी शुरू होती है और कांग्रेस को घेरने के लिए एक बड़ा वर्ग नहीं जुट जाता है जबकि माननीय की मुस्कुराहट पर खामोशी छा जाती है। तर्क-वितर्क में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के वक्तव्य का उदाहरण देकर अपना चेहरा साफ करने लग जाते हैं। पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा ही होता है और ऐसा ही शायद होता रहेगा। मुलायम सिंह यादव के कथन, लड़कों से गलती हो जाती है से लेकर इसकी लंबी फेहरिस्त है। बेटी बचाओ का नारा बुलंद करने वाले भी अपने दामन पर लगे इस तरह के दाग को धोने के बजाय, छुपाने में ही अपनी प्राथमिकता दिखाते हैं।

पितृसत्तात्मक समाज की गंदी मानसिकता

दरअसल यह पितृसत्तात्मक समाज की गंदी मानसिकता ही है। बलात्कार जैसे धृणित कृत को पितृसत्तात्मक समाज ने हमेशा से ही संरक्षित और पोषित किया है। यदि ऐसा नहीं किया होता तो बलात्कार की पीड़िता ही समाज में निंदनीय नहीं होती। उसके लिए जीना दूभर नहीं होता। उसके लिए समाज आलोचना के दृष्टिकोण नहीं रखता। जबकि बलात्कार करने वाला पुरुष छाती ठोक कर समाज में जी नहीं रहा होता। उसे समाज प्रतिष्ठित नहीं कर रहा होता। उसकी आलोचना हो रही होती। परंतु बलात्कार के मामले में अन्य सभी जघन्य अपराधों से पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता विपरीत है।

यहां पीड़िता को ही कलंकिनी मान लिया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज के कई मामले समाचार संकलन के दौरान देखने को मिले हैं। दो साल में कई बलात्कार के मामले सामने आए हैं। जिसमें कुछ उद्धृत करता हूं। एक बलात्कार के मामले में पैदल अपने गांव जा रही नवविवाहिता को दोपहर के एक बजे गांव के खेत में पूर्ण तरह नग्न कर दो युवकों ने दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था। इस घटना में आरोपी पकड़े गए। परंतु आज तक उन्हें सजा नहीं हुई। ऐसे कई मामले हैं। जिसमें आरोपियों को कई सालों तक सजावार नहीं ठहराया गया। हाल में ही दुष्कर्म के एक मामले में एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म के बाद पूरा पितृसत्तात्मक समाज उसे बचाने में लग गया। प्रशासन, पुलिस और राजनीति का गठजोड़ भी सामने आया। मीडिया के दबाव में प्राथमिकी दर्ज करने की केवल औपचारिकता की गई । 

तीन तलाक और हलाला

दरअसल, पितृ सत्तात्मक समाज का यथार्थ यही है। बेटियों को दबाकर घरों में रखना ही श्रेष्ठकर, इसी सोच का परिचायक है। घरों से निकलने वाली बेटियों को तारती खूंखार आंखें हर जगह  है। ऐसा एक खास धर्म, समाज, वर्ग, जाति में नहीं है। सामान्य तौर पर सभी की यही स्थिति है। कहीं कुछ कम, कहीं कुछ ज्यादा। ऐसा  नहीं होता तो तीन तलाक और हलाला जैसे जघन्य कृत्य को तर्क-कुतर्क से धर्म की आड़ में जायज ठहराने वाला समाज रोड पर आंदोलित नहीं होता। ऐसा नहीं होता तो कोठे पर देह बेचने वाली कलंकिनी केबल नहीं होती, बल्कि उसके खरीदार, तथाकथित प्रतिष्ठित समाज के लोग भी कलंकित कहे जाते।

कल ही बेटियों की शादी की उम्र को 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष निर्धारित किया गया।  उत्तर प्रदेश के एक सपा सांसद ने बेटियों के आवारागर्दी बढ़ने की बात कह कर इसी पितृ सत्तात्मक समाज के जयघोष किया। सरकार की सोचे है कि बेटियों को इससे अपने कैरियर को संवारने का और मौका मिलेगा।  परंतु पितृ सत्तात्मक समाज की सोच है कि बेटियों को अपना कैरियर नहीं बनाना चाहिए। बेटियों को घरों में आज भी चूल्हा-चौका तक ही सीमित रहना चाहिए। यह एक भोगा हुआ सच भी है। तथाकथित प्रगतिशील समाज के निकृष्ट लोग बाहरी आवरण ओढ़ कर स्त्री की स्वतंत्रता की बात तो करते हैं परंतु जब अपने घर में इस तरह की बात होती है तो स्त्री दमन के सभी को कृतियों, साजिशों, नीचता पूर्ण काम को करने से हिचकते नहीं। इसी पितृसत्तात्मक समाज के तथाकथित प्रगतिशील वर्ग के लोग उनकी हां में हां मिलाते हुए बेटियों के दमन को स्वीकार करते हैं। समाज हमेशा से बेटियों को दोयम दर्जे का ही स्थान देता है। कहने की बात और है, करने की बात और। 
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बेटी स्वतंत्र नहीं सोच सकती 
बेटी स्वतंत्र आगे नहीं बढ़ सकती 
बेटी खोंख नहीं सकती 
बेटी बोल नहीं सकती 
बेटी प्रेम नहीं मांग सकती 
बेटी नापसंद नहीं कर सकती 
बेटी ना नहीं कर सकती 
बेटी बाहर नहीं निकल सकती 
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बाबा शंखा-पानी ढार के बिरान कईला जी

इसी समाज के पितृसत्तात्मक सामाजिक सोच के विरोध की एक बानगी यहां देखने को मिला। जब भोपाल के करेली गांव की एक आईएएस बेटी तपस्या ने अपने पिता को विवाह के समय दान करने से मना कर दिया। बेटियों के विवाह में हिंदू धर्म में बेटी को दान कर पराया करने का एक अमानवीय कृत्य किया जाता है।  बाबा बेटवो से बढ़कर दुलार कैला जी, बाबा शंखा-पानी ढार के बिरान कईला जी। यह गीत, बेटी विवाह का परंपरागत गीत  है।और बेटी को पराया करने के चलन का परिचायक भी। आमतौर पर विवाह के बाद बेटी को पराया धन कहा जाता है। और इसी पराए धन में बेटी दहेज लोभियों के हाथों जलकर मर जाती हैं या सिसक सिसक कर जीती है। समाज उसी के साथ खड़ा होता है। बाकी  यह सब चलता ही रहेगा । बदलने के लिए, मुझे बदलना होगा। हम बदलेंगे युग बदलेगा। टिप्पणी में सकारात्मक बातें कर देना भर कुछ नहीं है। बदलाव अपने स्तर से करना ही देश दुनिया और समाज के बदलाव का जय घोष होगा।