स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय का चार दिवसीय आश्रम प्रवास से लौट आया। जीवन का एक नया अनुभव मिला। जीवन में उन अनुभवों को हमारे जैसा सामान्य आदमी तब तक शत प्रतिशत उतार पाना मुश्किल है, जब तक आदमी हार या थक न जाए। जो इन अनुभवों को जीवन में पहले धारण कर ले, वही संत है। कई थके हारे लोग आश्रम में मिले। सेवानिवृत..के बाद ..!
खैर, आश्रम में डिजिटल डिटॉक्स, मेंटल डिटॉक्स और फिजिकल डिटॉक्स हुआ। चार दिनों तक बिना मोबाइल रहा।
बिना मोबाइल भी जीवन जिया जा सकता। न कोई सेल्फी की होड़। न रील बनाने की प्रतिस्पर्धा। बस सबकुछ अपने लिए।
आज के दौर में यह मुश्किल है, पर अब इसी की जरूरत है।
आश्रम में बहुत कुछ सीखा। बहुत कुछ अनुभव हुआ। कुछ कुछ अनुभूति हुई। और सबसे विशेष, स्वामी निरंजनानंद जी से स्नेह मिला। यह अतुल्य और अकल्पनीय रहा।
स्वामीजी कौन है? यह सवाल मन में उठेगा तक भी इसका जवाब इस इंटरनेट की दुनिया में कम ही मिलेगा। आज अधजल गगरी, छलकत जाए वाले वायरल बाबाओं का दौर है।
इस दौर में स्वामी निरंजनानंद जी चुपचाप योग और मंत्र विज्ञान पर शोध और साधना कर रहे। दुनिया स्वामी जी के शोध और साधना का लोहा मान चुकी है। पर हम बिहार के लोग, अपने घर में इतनी बड़ी उपलब्धि होने के बाद भी उसका सम्मान नहीं कर रहे।
खैर, आश्रम प्रवास में 4 बजे से 7 बजे, योग, ध्यान, मंत्र, साधना, कर्म योग (साफ सफाई) जैसे गुरुकुल जीवन का अनुभव मिला। दुनिया के कई देशों के लोग यहां प्रवास करते मिले।
और इसी में जाना कि जो शारीरिक योग हम करते है, वह योग का दस प्रतिशत हिस्सा ही है।
बस, इतना ही। बाकी बातें फिर कभी
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