सांप की ही तरहआदमी भी छोड़ता है काचूर ...
कभी धन-सम्पदा
कभी मान-प्रतिष्ठा
कभी कभी तथाकथित
विद्वता का...पारदर्शी काचूर ...
काचूर छोड़
सांप देह से उतार देता है
अपने अस्तित्व का एक हिस्सा....
और आदमी
ओढ़े रखता है
अपने अंहकार को
काचूर की तरह....
सुना है कचुराल सांप
डंसने से बचता है
पर कचुराल आदमी
डंसता रहता है
अपना-पराया
सबको....