20 जनवरी 2014

बिहार सरकार, अवैध शराब और पुलिस

बिहार सरकार ने प्रदेश को शराब प्रदेश बना दिया। यहां गली गली शराब की सरकारी दुकानें खोल दी गई । हवाला दिया गया कि इससे अवैध शराब पर अंकुश लगेगी। पर मामला उलटा ही निकला। जहां गांवों में शराब बेचने की खुली छुट मिल गई वहीं इसी के साथ साथ चुलौआ अवैध शराब की बिक्री भी जमकर होने लगी। अकेले शेखपुरा जिले में 500 से अधिक घरों में चुलौआ शराब बनाई जाती है और एक दर्जन ठिकानों पर नकली शराब की पैंकिंग होती है।

शराब का यह अवैध करोबार पुलिस की साझेदारी से ही चलती है। एक अडडों से पुलिस को 1000 से 1500 तक का बंधा बंधाया रकम मिलती है। इस हिसाब से यह पच्चास लाख इस काला कारोबार से सिर्फ पुलिस के हिस्से जाती है। वहीं नकली पैंकिंग करने वालों के द्वारा एक लाख तक का महिने में नजराना दिया जाता है। जितने थानों में इनका करोबार है उतने में बंधी रकम पहूंच जाती है। 
अब भला इतने बड़े काले कारोबार को पुलिस क्यों बंद करना चाहिए। इसी वजह से जब भी कहीं छापेमारी होती है पुलिस कारोबारियों को पहले से ही सूचना देते है और छापेमारी की औपचारिकता पूरी हो जाती है।

16 जनवरी 2014

दिया कबीरा रोय...


शेखपुरा (बिहार) 
जिले के बरबीघा थाना क्षेत्र के मालदह गांव में कबीर मठ हमारे आध्यात्मिक पतन का प्रमाण है। यह मठ बदहाल है। यहां एक महिला साध्वी रहती है। उन्होने अपना सारा जीवन कबीर प्रेम और उनके संदेश को समर्पित कर दिया। आज यह मठ पूरी तरह से बदहाल है। इसके हिस्से के एक एकड़ से अधिक जमीन पर गांव के दबंग कब्जा करना चाहते है और इसको लेकर हत्या भी हो चुकी है। वहीं गांव के कुछ लोग इसको बचाने के लिए भी प्रयासरत है। पर परिणाम, कबीर दास आज अपने ही कही साखियों को पढ़ कर रो रहे है... इस मठ और आदमी के आध्यात्मिक पतन को देख कर..


कुछ तस्वीरें 










15 जनवरी 2014

बांझ का बदला (सच्ची घटना पर आधारित एक कहानी )

बात 2007 के जनवरी महीने की है। शाम के पांच बजे थे और लग रहा था जैसे रात हो गई हो। शीतलहरी सांय सांय चल रही थी। अमूमन ऐसे मौसम में शाम में नहीं निकलता था पर आज जाने क्यों मन नहीं लग रहा था, सो बाइक उठाई और निकल गया। सबसे पहले थाना गया। सोंचा शायद कोई खबर ही मिल जाए। एक रिर्पोटर की जिंदगी में अक्सर ऐसा होता है कि जब आप प्लान नहीं करते है और बड़ी खबर आपको मिल जाती है। देखा थानेदार एक स्त्री को डांट रहा है पर वह स्त्री निडर होकर उससे बोलती जा रही है।
‘‘चुप रहती है कि नहीं, बरी आई है केस करने? भतार पर केस करके की मिलतौ?’’
‘‘नै साहेब, आय पांच साल से तो हम चुप्पे ही, पर आय नै। आय उ निरबंशा हमरा केरासन छिट के जला रहल हल, पर हमर जिनगी इतनौ सस्ता नै है।’’ 
‘‘बड़ी खच्चड़ जन्नी है भाई, ऐसनो...’’
‘‘हां जी दरोगा बाबू, खच्चड़ तो हम हैइऐ ही, तोहूं मर्दाने ने हो, उकरे दने बोलभो, उ निरबंशा, हिजड़बा के चढ़े के समांग नै है और बांझ बोल के मारो है हमरा।’’
तब थानेदार की नजर मुझ पर गई और उसने अपना टोन बदल दिया-
‘‘ठीक है, ठीक है लाओ लिख के दो..केस कर देते है... पर केस करने से घर थोड़े बस जाएगा...?’’
‘‘हमरा अब घर बसाना नै है.... ओकरा सबक सिखाना है।’’
मैं समझ गय, मामला कुछ गंभीर है, सो एक कुर्सी खींचकर बैठ गया। उस स्त्री की उम्र वही कोई पच्चीस साल के आस पास होगी। उसके शरीर से केरोसीन की बू आ रही थी और उसका सारा शरीर केरोसीन से भींगा हुआ था। उसके शरीर का गठीलापन उसकी तरफ नजर उठाने पर विवश कर रहा था। गेहूंआ रंग, साधारण कद काठी और बड़े बड़े उभार...जो उसके ब्लाउज के खुले हुए हुक से बार बार अश्लील ईशारे कर अपनी ओर खींच रही थी और थानेदार दोनों उभारों के बीच गहरी घाटी में डूब उतर रहा था। मैं भी अपनी आंखों को तृप्त करने से खुद को नहीं बचा सका। एक भरपूर नजर उस स्त्री पर डाली और एक ठंढी आह भरते हुए कहा-
‘‘क्या बात है बड़ा बाबू, क्या कष्ट है इसको?’’
‘‘कुछ नहीं बस सांय-माउग का झगड़ा है झूठ-मूठ के पुलिस को घसीट रही है।’’
‘‘सांय-माउग का झगड़ा! वाह, कोेई जान लेवे पर उतरल है औ तोरा सांय-माउग के झगड़ा नजर आबो है।’’
‘‘क्या बात है बताइऐ, मैं एक रिर्पोटर हूं, शायद कुछ मदद करू?’’
‘‘देखो उ हिजड़बा की कैलक है।’’
और उसने कमर पर लपेटी हुई सूती की पतली सी साड़ी बेझिझक हटा दी। ओह, वहां जख्मों के कई निशान थे  और उससे रिसता हुआ लहू अभी ठीक से सूखा नहीं था। फिर उसने अपनी पीठ को मेरी तरफ करके पेटीकोट को थोड़ा नीचे सड़का दिया। कई नए पुराने जख्म समूचे पीठ में किसी के क्रुरूरता की गवाही दे रहे थे। फिर वह जांधों पर बने जख्म दिखाने लगी और मैने रोक दिया, बस बस हो गया।
‘‘नहीं साहेब, देख लहो! सांय-माउग के झगड़ा केतना जुलम करो है? औ हां हमरा अब कौनो लाज नै है साहेब, इहे लाज त पांच बरिस तक मार गारी खाय पर विवश कर देलकै। अब बचल की, जिनगिये नै रहतै तब की करबै, निरबंशा कहो है जरा के मार देबौ और सब कहतै बांझी अपने से मर गेलै।’’
अब मेरे कैमरे ने अपना काम प्रारंभ कर दिया था। उसके जख्मों को उसके दर्द के साथ साथ कैद करने लगा।

ओह, शादी के पांच साल हो गए थे और बच्चा पैदा नहीं कर पाने की सजा परवतिया झेल रही थी। उसके शरीर पर बने जख्म उसके मां नहीं बन पाने की सजा थी।
मेरी उपस्थिति ही इस बात की गवाही थी कि थानेदार अब रिर्पोट दर्ज कर कार्यवाई करेगा, क्योंकि किसी पीड़ित की खबर को प्राथमिकता देने की मेरी फितरत से वह आने के कुछ ही माह में वाकिफ हो गया था। सो कागजी कार्यवाई के बाद पुलिस की जीप निकली और थानेदार उसपर परवतिया को बैठा कर चल पड़ा। पीछे पीछे मैं भी हो लिया। शीतलहरी और कुहासे को चीड़ता हुआ उसके गांव पहूंच गया। पुलिस की गाड़ी जैसे ही गांव में प्रवेश किया, गांव के बच्चे और बड़े उसके पीछे पीछे चलने लगे। उसके घर के पास पुलिस पहूंची तो गांव के लोग बड़ी संख्या में जमा हो गए। 
‘‘रमचरना के माउगी पुलिस लेके आई है।’’ जंगल में आग से भी तेज गांव में यह खबर फैल गई थी। उसके घर से रमचरना की मां निकली और सीधा जाकर परवतिये में मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया। 
‘‘हो गेलौ मन पूरा, रंडीया, खजनमा के एकगो टुसरी तो निकललै नै और पुलिस ले के आ गेलहीं हैं।’’
परवतिया भी जैसे कोई फैसला की करके आई थी आज-
‘‘टुसरी निकलतै कैसे? बेटबा से नै पूछीं की ओकर टूसरिया उठो हउ।’’ 
सारा गांव सन्न रह गया, जितनी मुंह उतनी बातें। एक दम मरदमराय औरत है भाई, ऐसनो बात बोले के है....?
‘‘त हम त पहले से ही कहो हलिए इ औरत छिनार है, अपने गांव के सन्टुआ से फंसल हैलै, अब इ सब करके हिंया से भागे ले चाहो है..।’’ 
यह बात गांव में लफंगबा के नाम से प्रसिद्ध सरोवर सिंह ने कही तो परवतिया बौखला गई-
‘‘ हां, हां, छिनार तो हम हैइए हीए! तोरा से करबा लेतिए हल तो बड़की सति-सावित्री हो जइतिए हल, तो हीं ने तीन बार हमर छाती पकड़ के पटके के प्रयास कैलहीं हें और तीनों बार करारा जबाब मिललै, रंडीबजबा।’’
पुलिस पुछताछ कर लौट आई, पूरे गांव में किसी ने परवतिया के पछ में बयान नहीं दिया। जिसने भी गवाही दी सबने कहा कि बांझ है और छिनार भी...। परवतिया पुलिस जीप से ही थाने लौट आई। अब वह उस घर में एक पल भी नहीं रहना चाहती। कड़ाके के ठंढ के बाबजूद उसका शरीर जल रहा था। उसके आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे। और वह पूराने ख्बाबों में खो गई।

शेष अगले अंक में.... अगले सप्ताह..



14 जनवरी 2014

मकरसंक्रान्ति पर कुरीति के खिलाफ आवाज..

मकरसंक्रान्ति को तो वैसे तिल और दही-चुड़ा का त्योहार माना जाता है पर इस पर कुरीतियों का भी कुप्रभाव है। 14 जनवरी को होने वाले इस त्योहार को लेकर बचपन से मैं डांट सुनता रहा हूं। मेरे यहां अंधविश्वास है कि 14 जनवरी के दिन स्नान करने पर कुवांरे लड़के-लड़कियों को दुल्हा-दुल्हन काला मिलते है। 
जब से होश संभाला तब से इसी दिन ही स्नान करने लगा। इसको लेकर भारी डांट पड़ती थी पर मैंने इसके खिलाफ आवाज उठाई। वहीं मकरसंक्रान्ति की सुबह स्नान कर अलाव अथवा बोरसी में तिल जला कर तापने की परंपरा है। इसके साथ ही मां पूजा-पाठ कर अपने बेटों को तिल, चावल और गूड़ का बना प्रसाद देती है। परंपरा अनुसार यह प्रसाद सिर्फ बेटों को ही दिया जाता है। साथ ही प्रसाद देते हुए मां पूछती है कि बड़ा होकर उसको (बह्य) देगी या नहीं? इसका मतलब होता है कि बड़ा होकर बेटा उसको अपनी कमाई देगा अथवा उसकी सेवा करेगा कि नहीं? हलंाकि मैं अपनी मां को ऐसा करने से नहीं रोक सका क्योंकि उसका दिल रखना भी जरूरी था पर इस साल यह पूजा मेरी पत्नी रीना करेगी और सुबह सुबह ही उसने सुना दिया कि (बह्य) वह बेटा और बेटी दोनों को देगी साथ ही उसने कहा कि (बह्य) देते हुए वह बेटा से कभी यह नहीं कहेगी कि कमाई दोगे की नहीं? अपने ही बेटों से यह सौदा क्यों करू? और बेटा-बेटी में अंतर क्यों? बेटी, बेटा से कम नहीं करती सो अंतर क्यों? मन प्रसन्न हो गया और साथ ही यह भी जान गया कि परम्परा को बनाए रखने और तोड़ने में महिलाओं को बड़ा योगदान होता है...

12 जनवरी 2014

या खुदा....



या खुदा, मुझको आतिशी-आरजू न दे।
मेरी रगो में मजहबी लहू न दे।।

तेरी पहलू में आदमी की जियारत हो।
या खुदा, इस कदर पैगम्बरी-जुस्तजू ने दे।।

या खुदा, तेरी लाशों पे बनाउं मंदिर-मस्जिद।
ऐसी दोजखे-तमन्ना से होने रूबरू ने दे।।

09 जनवरी 2014

बिहार में पदाधिकारी के जनता दरबार में शिकायत करने पर मारी थप्पड़, भेजा जेल।

बिहार में पदाधिकारी के जनता दरबार में शिकायत करने पर मारी थप्पड़, भेजा जेल। 

बिहार सरकार में किस तहर अधिकारी बौखला गए है इसका नजारा विडीओ में देखिए । शेखपुरा एसडीओ सुबोध कुमार इस युवक को थप्पड़ मार रहे है। युवक बरबीघा के कुसेढ़ी गांव का रहने वाला है। युवक की गलती यह है कि इसने अपने हक लिए एसडीओ से उंची आवाज में बात की। युवक लगातार डीएम के जनता दरबार में फरीयाद लेकर आता था। उसके गांव के जनवितरण दुकान के द्वारा मनमानी की जा रही थी और उकसे बुढ़े पिता को पेंशन नहीं मिल रहा था पर उसे लगातार आश्वासन ही मिल रहा था इसी से नाराज युवक ने आज पदाधिकारी से उलझते हुए एक निश्चित तिथि तय करने पर जोर दिया। इसी से नाराज होकर एसडीओ सुबोध  कुमार ने उसे पीटा और फिर जेल भेज दिया। बिहार में पदाधिकारियों के निरंकुशता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है..