03 अप्रैल 2026

बेटा (लघु कथा)

बेटा 
(अरुण साथी की लघु कथा)

रामदेव । आजीविका चलाने के लिए वह अपनी जवानी हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव में गार्ड की नौकरी करते बीता दिया। 

इसी बीच उसका इकलौते बेटा आर्मी का जवान बन गया। घूमघाम से शादी की। उम्र के ढलान पर वह  गांव आ गया। 
समय बीता। उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। घर चलाने का खर्च जैसे तैसे चलने लगा। रामदेव की पत्नी भी ज्यादातर बीमार रहती।
रामदेव ने बेटा से कभी कोई पैसे की मांग नहीं रखी। बेटा कभी कभी पत्नी के खाता पर कुछ पैसे भेज देता, जिससे गुजारा होना मुश्किल था।

एक दिन पत्नी के समझाने पर रामदेव में बेटा से बात की।

"बेटा, घर चलाना मुश्किल होता है। तुम्हारी मां भी बीमार है। इस माह पांच हजार भेज देता तो राहत होती।"

बेटा ने तपाक से उत्तर दिया। 

"पिताजी, 50 हजार वेतन है। एक पैसा नहीं बचता। बच्चे की पढ़ाई। घर का किराया। घर चलाने का खर्च। कई तरह का ईएमआई।"

रामदेव चुप हो गया। पर उसके अंदर कुछ टीस रहा था। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी हाथी ने अपना पांव रख दिया हो।

वह अतीत में खो गया। उसका वेतन नौ हजार महीना था। बेटा को पटना में तैयारी कराया। हर महीना 5 से 7 हजार खर्च था। किसी किसी महीना तो 10 हजार। पर उसने कभी सोचा तक नहीं। और आज उसे यह जवाब मिला...रामदेव ने डबडबाई आंखों से पत्नी की तरह देखा, उसकी भी आंखों में आंसू थे...!


14 मार्च 2026

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

ज्ञान की पुण्य धरा नालंदा, जहाँ इतिहास की स्मृतियाँ आज भी ज्ञान की ज्योति बनकर आलोकित होती हैं। उसी धरा पर स्थित राजगीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में अखिल विश्व साहित्य उत्सव का अद्भुत और अनुपम आयोजन सजा। 

चार दिनों तक चल रहे इस साहित्यिक महोत्सव में देश-दुनिया के मूर्धन्य साहित्यकारों, विचारकों और रचनाकारों ने अपने विचारों से बिहार की माटी को मानो फिर से सिंचित कर दिया। लेखक, पत्रकार, चिंतक, दार्शनिक, कवि, शोधार्थी, इतिहासकार, प्रशासनिक अधिकारी और युवा, सभी की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को एक जीवंत बौद्धिक संगम का रूप दे दिया।

इस महोत्सव का संयोजन वैशाली जी ने किया। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जिनका नाम वैशाली है, वे बिहार की नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की हैं। यह तथ्य अपने आप में इस बात का जयघोष है कि बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान आज भी देश और दुनिया के लोगों को आकर्षित करती है।
इसी समारोह में बिहार की माटी की सुगंध को अपने शब्दों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचाने वाले प्रखर कवि और छोटे भाई संजीव मुकेश जी के स्नेहिल आमंत्रण पर, साथी सुधांशु शेखर के साथ वहाँ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह केवल एक आयोजन में सहभागिता भर नहीं थी, बल्कि एक नई ऊर्जा, नए अनुभव और नए विचारों से साक्षात्कार का अवसर भी बनी। वहाँ उपस्थित सृजनधर्मी लोगों के चिंतन और संवाद को आत्मसात करना अपने आप में एक समृद्ध अनुभव रहा। 
महोत्सव का समापन जब ऋषिकेश के बाबा कुटानी के वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनियों के बीच ध्यान सत्र से हुआ, तो वातावरण मानो आध्यात्मिक शांति से भर उठा। उस क्षण मन अभिभूत था और हृदय में यह अनुभूति गूंज रही थी कि साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाली एक जीवंत साधना है।

08 मार्च 2026

नीतीश कुमार के बगैर बिहार

बिहार अब नीतीश कुमार के बगैर होगा। और दो दशकों तक सुशासन में जीता बिहार का सामान्य मानस चिंतित हो गया है। अब बिहार का चिंतित मानस नीतीश कुमार के बगैर बिहार में सुशासन हो सकता है, इसको लेकर सशंकित है। बिहार के चिंतित मानस में कई वर्ग है । अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सर्वाधिक चिंता बिहार की नारी शक्ति को है । नारी-सशक्तिकरण, बेटियों के जीवन में बदलाव का मानक नीतीश कुमार है। शायद ही दूसरा कोई इतना कर पाए। एक वह वर्ग है जो भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रतिद्वंदियों का दमन देख रहा है। बिहार के समाजवादी मानस को देख नीतीश कुमार ने इसे संतुलित कर रखा था। एक वर्ग अधिकारियों का है। शासन सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार ने पजामा कुर्ता छाप नेताओं की प्रशासनिक पकड़ को थाना ब्लॉक से लेकर पटना के सचिवालय तक से खत्म कर दिया। यह वर्ग भी चिंतित है। हालांकि, इसका दुष्परिणाम भी हुआ और कई अधिकारी निरंकुशता तक चले गए। थका हारा बिहार मानस भ्रष्टाचार को सहज स्वीकार कर लिया। नीतीश कुमार के बगैर बिहार में युवा मानस भी चिंतित है। जिस स्तर पर बढ़कर उन्होंने नौकरी दी, इसके बाद युवाओं का चिंता उचित ही है। नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री से हटाने में कई किंतु परंतु हैं। परंतु स्वास्थ्य का कारण एक ठोस बहाना बताया जा रहा है। अब निशांत कुमार राजनीति में ऐसे उतर रहे हैं जैसे कोई अबोध बालक कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उतर रहा हो। निशांत कुमार राजनीति के तिकड़मी चक्रव्यूह में उस एकलव्य की तरह हैं, जिसने माता के गर्भ में अपने पिता से, युद्ध का कौशल भी नहीं सीखा है..! अब अपने कई प्रदेशों में अपने कथित चातुर्य और लोमड़ी कौशल से सत्ता हथिया कर उसे संभालने वाली बीजेपी, बिहार को कैसे संभालेगी, यह एक यक्ष प्रश्न है..। अभी जो दिखता है, वह यह है कि गुजरात का व्यापारी बिहार के मजदूरों को अपने विकास की सीढ़ी में उपयोग करना अच्छी तरह से जानता है। और उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने वाला बिहारी मानस भी इस चातुर्य को समझता है। अब, इस महीन से अंतर में कब जरा सा इधर-उधर हो जाए , कोई नहीं जानता। शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जल बिछाएगा, हम नहीं फसेंगे... इस मंत्र को रटने वाला बिहार, जाति के जंजाल में अक्सर फंसता रहा है, परंतु धर्म के जंजाल में फंसने से अक्सर बचत भी रहा है... अब जाति और धर्म का महाजाल बिछ गया है.... बाकी सब ठीक है...पर यह ठीक नहीं है कि अब समाजवाद का अंतिम किला ध्वस्त हो रहा है और वंशवाद की राजनीति के प्रखर विरोध का भी स्वाहा हो रहा है

07 मार्च 2026

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

"हेलो, हेलो, हेलो, खेलावन काका बोल रहे हैं..! का हाल वा बउआ..! सब ठीक वा...।"

आज काका बड़ा बेचैन थे। पर उनके आवाज में एक अजीब सा उत्साह भी था। 
मैने कहा, "सब ठीक है काका। बस बिहार की चिंता हो रही है।"

काका बोले, "चिंता का कौउनो बात नहीं है। राजनीति में तो यह सब होता ही रहता है। सब फार्मूला फिट कर दिया गया है।"

"पर काका, यह तो जबरदस्ती है न। चाचा तो सबकुछ इस्मूथली चला हो रहे थे...?"

मैंने पूछा, "काका ई मुख्यमंत्री कौन बनेगा...? यह सवाल तो हजार करोड़ का है..! जिसको देखिए, वही किसी को मुख्यमंत्री बना दे रहा।"


काका उवाच, "बउआ, जब तक कोय मुख्यमंत्री बन नहीं जाता, तब तक के लिए किसी को भी मुख्यमंत्री बना देने से किसी को क्या दिक्कत हो सकती है। लाइक, व्यू और नोट कमाने वालों से लोग एतना जलते काहे हैं...! जलानखोर सब..."

काका ने फिर टोका, "अच्छा सुनो बउआ, क्या तुम मुख्यमंत्री बनना चाहते हो...?

"कौन नहीं चाहेगा काका, क्यों मजाक करते हैं...!"

"अरे, यह मजाक नहीं है। जल्दी से दस रुपये ऑनलाइन से भेजो...!"

काका की बात भला कौन उठाता। मैंने दस रुपये भेज दिए।

बस कुछ ही देर बाद मोबाइल में मेरे मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना का समाचार ब्रेक हो गया...! 

अरुण साथी

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05 मार्च 2026

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

अरुण साथी

दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर है। यह खतरा बम से बड़ा, धार्मिक कट्टरता से है। ऐसा कई विश्लेषक मानते है। अभी ईरान, अमेरिका युद्ध में भी यह दिखा। पर एक उससे भी बड़ा खतरा है, उसे सभी नजरअंदाज कर रहे। यह खतरा, सोशल मीडिया का कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। यह खतरा सोशल मीडिया का अल्गोरिथम है। यह अल्गोरिथम, बम से ज्यादा खतरनाक है। 

यह कैसे खतरनाक है, उसे समझने के लिए, आपको अपने मोबाइल के स्क्रीन को देखकर समझना होगा।

खतरा यही, आप जो देखते है। कुछ सेकेंड भी। यह अल्गोरिथम उसे पकड़ लेता है। फिर आपको वही दिखाया जाता। 

मतलब, यदि आप अमेरिका के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह खोज–खोज कर वही दिखाएगा। यदि आप ईरान के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा।

यदि आप मोदी समर्थन का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा। यदि आप विरोध देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा.. !


यदि आप एक धर्म से घृणा का वीडियो देखते है, तो आपको खोज–खोज कर घृणा का वीडियो दिखाया जाएगा। 

इतना ही नहीं, यदि आप, किसी धर्म, व्यक्ति, समाज, देश से प्रेम, सद्भाव का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाएगा। 

तब, खतरा क्या है। समझिए। इस एल्गोरिथम को गांव की घरेलू महिला से लेकर, पॉश घरों की महिलाओं ने पकड़ लिया है। इतना ही नहीं , युवती और कम उम्र की किशोरियों ने भी इसे पकड़ लिया। कैसे, तो महिलाओं को यह पता है कि पुरुष समाज कामुक है। इसमें उम्र की सीमा नहीं है। तो आपके मोबाइल स्क्रीन पर कामुक वीडियो दिखे तो इसके लिए किसी स्त्री को कोसने से अच्छा, पुरुष समाज को कोस सकते है। क्योंकि स्त्री का कामुक, उत्तेजक, या अश्लील वीडियो सबसे अधिक देखा जाता है। और इसे हम, आप देखते है। पर इसे दिखाने वाला एल्गोरिथम ही है ।।



बस यही खतरा है। यह एक पक्ष को दिखाता है। केवल एक पक्ष। अब इस बजह से यदि आपका मन घृणा, हिंसा, कामुकता देखना पसंद करता है तो अल्गोरिदम खोज–खोज कर उसे दिखाता है। 

और तब हमारा मन यह मान लेता है कि दुनिया बहुत बुरी है। कोई धर्म, समाज, स्त्री बहुत बुरी है। तब हम हर पक्ष का केवल एक पक्ष देखते है। 

और इसका दुष्परिणाम भी सामने आ रहा। समाज टूट रहा है। परिवार टूट रहा है। अपने ही अपनों को मौत दे रहे हैं।

क्या इससे बचना संभव नहीं है..? क्योंकि करोड़ों का पैकेज लेने वाले हमें इसी जाल में फंसाने के लिए लगे है!


संभव है, हम चाहें तो बच सकते है! हम अच्छा देखें, प्रेम देखें, सामाजिक और धार्मिक सद्भाव देखें। फिर हमें वहीं दिखेगा। और हमें लगने लगेगा, दुनिया अच्छी है। इसके लोग अच्छे है..


अंत में निदा फ़ाज़ली की यह गजल सब कुछ कहती है,
**"

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया

चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया

घर में ही मत उसे सजाओ इधर उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुम से अब तक खुली नहीं है दुनिया

भाग रही है गेंद के पीछे जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से अब तक डरी नहीं है दुनिया

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03 मार्च 2026

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश 

(अरुण साथी, महामूर्ख सम्मेलन का स्वागत भाषण जिसे बुद्धि वालों के द्वारा जानबूझ कर पढ़ने का मौका नहीं दिया गया. )
महामूर्ख सम्मेलन में आए हुए सभी सम्मानित मूर्खों का हम हृदय से अभिनंदन करते हैं । बंदन करते हैं। नंदन करते हैं। चंदन करते हैं।
जैसा कि हम सबको मालूम है कि अभी पृथ्वी से मूर्खों की संख्या में बहुत कमी आ रही है और मूर्खों की प्रजाति विलुक्ति के कगार पर पहुंच गया है।
ऐसे में हम सब की महति जिम्मेवारी बनती है कि मूर्खों के विलुप्ति के कगार से बचाने के लिए मूर्खों की संख्या में लगातार वृद्धि को लेकर हम सब सतत प्रयास करें।
आज जहां डिजिटल और सोशल मीडिया का युग है वहीं अब कृत्रिम मेधा का भी युग आ गया है। ऐसे में अब मूर्खों के लिए कहीं भी कोई स्पेस नहीं बच रहा है।
यह युग हम मूर्खों के लिए बेहद ही खतरनाक है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की बात करें तो यहां जितने भी लोग अपने-अपने पोस्ट देते हैं उनको देखकर हम सब समझ रहे हैं कि सभी विद्वान, सभी गुनी, सभी सत्यवादी, सभी सत्य निष्ठ और सभी संत, महात्मा, विद्वत जन ही सोशल मीडिया पर हैं। 


ऐसे में हम सब मूर्खों को भी अब सोशल मीडिया पर मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए ताकि हम लोगों की उपस्थिति भी वहां दर्ज हो सके।

जैसा कि आप लोगों को मालूम है कि आज ही इस दुनिया के सर्वशक्तिमान और सर्वाधिक बुद्धिमान हड़ंप महाराज के द्वारा तेल के खेल में बिना ताज वाले किताबी दुनिया बनाने वाले  खरीफा सहित कई खरीफो की जान ले ली। इतना ही नहीं, इस पृथ्वी के बुद्धिमान प्रजाति में से एक रसिया  के राजा  और पड़ाेसी के बीच चार साल से चल रहा युद्ध भी आदमी के बुद्धिमान होने का परिचय दे रहा है।

दुनिया के कई देशों के बीच बुद्धिमान आदमी, बुद्धिमान आदमी से लड़ रहा है। 

अपने देश में भी आजकल बुद्धिमानों की संख्या बहुत बढ़ गई है। कई जगह बुद्धिमान लोग अपनी (अ)धार्मिक बुद्धिमत्ता से (अ)धर्म के नाम पर जान ले रहे हैं।
 कई जगह इसी बुद्धिमान की श्रेणी में आने वाले लोग जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, रंग के नाम पर भी जान ले रहे हैं।
ऐसे में हम मूर्खों को एकत्रित होकर, संगठित होकर और मजबूती से कार्य करना होगा, ताकि हम लोग हमेशा मूर्खतापूर्ण काम करते हुए आपस में प्रेम और भाईचारा बनाकर रखें।धर्म, जाति, भाषा, रंग के नाम पर हम किसी की जान न लें।

25 फ़रवरी 2026

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?


हम अपने अहंकार को देख सकते हैं। समय समय पर अहंकार, ज्वारभाटा की तरह उठता है। और डुबो देना चाहता है। आदमी के स्व को। हम कोशिश करें तो इसे बड़ी सहजता से देख सकते है। या कहें कि हम सब देख कर भी अनदेखा कर देते है। 
जैसे, किसी समारोह में अगली पंक्ति में बैठने का अहंकार। जैसे, किसी आयोजन में मंचासीन होने का अहंकार। जैसे, किसी सम्मान समारोह में सम्मान पाने का अहंकार। और इस अहंकार पर विजय पाना बड़ा कठिन है । 

अहंकार केवल धन, बल का ही नहीं होता। अहंकार तो ईमानदारी, सच्चाई, ज्ञान और प्रतिष्ठा का भी होता है। और यह सबसे विषैला अहंकार है। मैं भी अपने अहंकार को रोज रोज देखता रहता हूं। मुस्कुराता रहता हूं। साक्षी भाव से। इतना करना भी ध्यान में उतरने जैसा है। 

अहंकार शून्य आदमी होना संभव नहीं है। या तो वह संत होगा, या पागल...। 


दो दिन पहले यह अहंकार शून्य आदमी मिला। यह पागल था या नहीं। कहना मुश्किल....

रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....


रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन मेरे लिए सचमुच एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। पहली बार इस प्रकार का ओजस्वी और भावप्रवण प्रस्तुतीकरण देखने का अवसर मिला, जिसने मन और चेतना दोनों को आलोकित कर दिया।
जब छात्राओं ने ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियों को अपने स्वर दिए, तो प्रतीत हुआ मानो उनकी जिह्वा से ऊर्जा का कोई प्रखर स्रोत फूट पड़ा हो, जो उपस्थित प्रत्येक दर्शक के हृदय में उत्साह और स्पंदन भर रहा हो। सभागार में एक अद्भुत निस्तब्धता छा गई। दर्शक मंत्रमुग्ध रहे।

अवसर था बरबीघा स्थित डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल के वार्षिकोत्सव का, जहाँ इस काव्य-नाट्य मंचन ने कार्यक्रम को गरिमा और गौरव प्रदान किया।

मित्र सुधांशु शेखर की रचनात्मक कल्पनाशक्ति और लीक से हटकर कुछ करने की अदम्य आकांक्षा ने इस प्रस्तुति को संभव बनाया। विद्यार्थियों का अभिनय अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली रहा। वस्त्र सज्जा ने मानो महाभारत के युग को साकार कर दिया हो। संवाद-अदायगी सशक्त, संतुलित और हृदयस्पर्शी थी।
इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सभी संबंधित जनों के प्रति हृदय से आभार और अभिनंदन।

अरुण साथी 

18 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद से आजादी...!

ब्राह्मणवाद से आजादी...! 


( दलित चेतना और सवर्ण भाग 4)

आज गजाधर चट्टोपाध्याय (राम कृष्ण परमहंस) की जयंती है।  अभी नव ब्राह्मणवादी, नव सामंतवादी और नव प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध ले रहे। इसके पीछे इतने सालों का शोषण, दमन कारण बताया गया। रटाया गया। और आज भी रटाया जा रहा। अनुभव कहता है कि यह मिशनरियों इत्यादि के द्वारा प्रायोजित और आर्थिक पोषित अभियान का दुष्परिणाम है। 

अब  राम कृष्ण को देखिए। माता काली का दक्षिणेश्वर मंदिर रानी राजमती ने बनाया। अब उस मंदिर में कोई ब्राह्मण पुजारी बनना नहीं चाहते थे। कारण कि रानी एक शूद्र थी। तब एक ब्राह्मण ही आगे पुजारी बन कर समाज के लिए संदेश दिया। वे थे राम कृष्ण में बड़े भाई..! फिर राम कृष्ण भी बने।

राम कृष्ण परमहंस ने तो अद्वैत वेदांत व्यवहार में उतार कर संदेश दिया। सभी में एक ही ईश्वर।

इतना ही नहीं, राम कृष्ण तो ईसाई, इस्लाम इत्यादि धर्म को भी अनुभव उतार कर संदेश दिया , यतो मत, ततो पथ। रास्ता कोई हो, ईश्वर एक । 

12 फरवरी को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती थी। इन्होंने भी वेद को ही सत्य माना। पाखंड, परंपरा को तोड़ा। खत्म दिया।

अब मूल बात। दोनों ब्राह्मण थे। तो बस इतना। भेदभाव, छुआछूत, असमानता, गैर बराबरी नहीं थे, ऐसा नहीं है। पर इसके विरुद्ध लड़ाई ब्राह्मणों ने भी लड़ा । सवर्णों ने भी लड़ा। आज इन जैसों को खारीज कर दिया गया। दुख इस बात का है..बस..

02 फ़रवरी 2026

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण 

(अरुण साथी)

भारत सरकार ने अलौकिक बजट पुनः जारी किया। इसकी अलौकिकता न्यारी है। आम आदमी की समझ पर यह भारी है। लौकिक ज्ञान से परे अलौकिक ज्ञान जरूरी है। अतः, इसे अच्छा या खराब मान लेना ही बुद्धिमत्ता है। 

साधारण सी बात है। जो विपक्ष में है, वे इसे बेकार बजट बता रहे। जो पक्ष है, वे इसे साकार बजट बता रहे। इस पक्ष, विपक्ष में आम आदमी चक्कर खा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या समझे। 


अब देखिए, दीदी ने समझाया । यह दलित , महिला, ओबीसी, किसान, युवा विरोधी बजट है। तब खेलावन काका पूछ रहे।


"अरे, तब यह बजट सरकार ने अपने लिए लेकर आई है क्या..?"

तब इसको लेकर मुनि नारद ने ज्ञान दिया।

" देखो वत्स, यह अलौकिक है। फिर भी इसमें सार तत्व को समझ कर इसकी विशालता और व्यापकता को समझा जा सकता है। जैसे समझो । बजट में बच्चों को स्कूल में अब डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अब बच्चे अपने स्कूल में मोबाइल से रील बनाना सीखेंगे। फिर देश तेजी से आगे बढ़ेगा। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से देश में बुलेट रेल चल रही। और उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से  देश में स्मार्ट शहर बन रहे। समझे कि नहीं।"


काका कहां चुप रहने वाले। बोले, 

"मुनिनाथ । हमलोग तो बच्चों को रील बनाने से रोकते है। इसे अच्छा नहीं मानते।"

"यही तो लौकिक बातें है। पर समझो। तुम लोग बच्चों को क्यों पढ़ाते हो..? इसीलिए कि वह पढ़ लिख कर कमाई करे! अब इस बार चुनाव में सरकार ने प्रति वर्ष 2 करोड़ को नौकरी और रोजगार देने का वादा किया।"


"यह वादा इसी से पूरा होगा। अभी सर्वाधिक कमाई का साधन मोबाइल है। रील बना कर लोग प्रति महीना लाखों कमा रहे। इसमें कौशल की जरूरत है। हालांकि महिलाओं के लिए कोई कौशल आवश्यक नहीं है। पर पुरुष जबतक कौशल प्राप्त नहीं करेंगे तबतक इस क्षेत्र में कमाई मुश्किल है। इसी उद्देश्य से बच्चों में डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण आवश्यक है।"


अब काका चुप हो गए। मन ही मन सोचें। 

"मोदी अनंत, मोदी कथा अनंत,
यही गुणगान करे सब असंता...!"

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

यह 5 जनवरी की बात है। सुबह सुबह दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई। 

"बबलुआ, बबलुआ...!"

 बाहर निकला तो देखा इंदल मांझी की माय खड़ी थी। 

पूछा, "की होला"। 

बोली, "फटीचन मर गेलो !"

"कैसे ..?"

"बीमारी से"

"तब, हम की करियो..?"

"कुछ पैसा दहीं, कफन आदि खरीदे ले पैसा नै है... जरावे के लकड़ी के पैसा मिठ्ठू सिंह दे देलकै हैं...!"

मेरे पास नगद कुछ नहीं था। मैं बाजार गया। रितेश को ऑनलाइन भेजकर  नगद लिया। फिर आकर दे दिया। यह चुपचाप हुआ।  

यह एक बहुत लघु प्रसंग है। सार्वजनिक करना निश्चित ही सही नहीं है। पर वर्तमान में जातीय भेदभाव का विषवमन ऐसा है कि केवल सवर्ण होने भर से उसे शोषक बता कर प्रताड़ित किया जा रहा।  मेरा जन्म भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ। परंतु आर्थिक अभाव में वेदना ही सही है।

खैर, मेरा मानना है कि समाज में अच्छे, बुरे लोग हमेशा रहें है। पर अभी प्रायोजित तरीके से सवर्ण के विरुद्ध घृणा फैलाई जा रही। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वंचितों का शोषण नहीं हुआ। दमन नहीं हुआ। अथवा आज भी शोषण, दमन नहीं हो रहा। पर इसका मतलब यह है कि समाज में शोषक केवल जाति से निर्धारित नहीं है। यह एक नीच मानसिकता है। 


आज के समय में समाज को जोड़ने के छोटे छोटे प्रयासों की चर्चा अति आवश्यक है। समाज में रोज रोज ऐसे पहल होते है। समाज को जोड़ने का प्रयास होता रहा। होता रहेगा। 

जारी है..

01 फ़रवरी 2026

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

(दलित चेतना और सवर्ण)

अरुण साथी

पुण्य तिथि पर बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह को जन्म भूमि (माउर) जाकर नमन किया। अभी चुनाव नहीं है, इसलिए कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। फिर जगह जगह प्रतिमाओं पर लोगों ने माल्यार्पण किया। पुष्पांजलि की। आज के दौर ने बिहार केसरी ज्यादा प्रासंगिक हो गए। अभी महापुरुषों को जातियों में बांट दिया गया है।  श्री बाबू के साथ भी यही हुआ। भूमिहार ब्राह्मणों के कुछ नेताओं ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए यह किया। उनका स्वार्थ सध गया। समाज का नुकसान हो गया। हालांकि बड़ा वर्ग नेताओं के साथ नहीं गया। 
खैर, अभी सोशल मीडिया पर दलित विमर्श और दलित चेतना के नाम पर अर्ध सत्य को प्रसारित कर समाज को बांटने की बड़ा षडयंत्र हो रहा। और समाज बंट भी गया है। दलित वर्ग में सवर्णों के प्रति ऐसा विष बोया गया है दलितों का बौद्धिक वर्ग भी प्रतिशोध ले रहा..! 

1990 का मंडल आग एक बार फिर यूजीसी के बहाने, सुलगाने का प्रयास हुआ। और यह सुलग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर विराम लगाने की पहल की है पर नेताओं के द्वारा इस आग को हवा दी जा रही। 
नेताओं को पता है कि जब तक समाज जलेगा नहीं तब तक उनको कौन पूछेगा...? दुर्भाग्य से इस बार कमंडल वालों ने यह खेल कर दिया है।

हालांकि एक सकारात्मक बात यह हुई इस बार कुछ दलित और ओबीसी ने इसका खुल कर प्रतिरोध किया।  बकाई सोशल मीडिया पर विष वमन कर रहे...!

अब यूजीसी का बवाल थोड़ा शांत हुआ है। पर इसमें कई प्रश्न उठे है। 
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या समाज से भेदभाव, छुआछूत मिटाने की लड़ाई केवल दलितों के नेताओं , समाज सुधारकों ने लड़ी ...? क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

तो ऐसा नहीं है। संत रैदास, संत कबीर, संत तुकाराम इत्यादि के साथ साथ आदि शंकराचार्य , दयानंद सरस्वती , स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले इत्यादि लंबी सूची है। कईं बड़े नेताओं ने संघर्ष किया।

श्री बाबू ने दलितों को देवघर मंदिर में प्रवेश करा कर भेदभाव के विरुद्ध बड़ी लकीर खींची थी। वहीं जमींदारी उन्मूलन कर समाज में बराबरी की पहल की। दोनों मामले में उनके स्वजातीय उनसे नाराज हुए थे। श्री बाबू को तिरस्कार झेलना पड़ा था...
समाज में बराबरी की पहल समाज में नीचे के स्तर पर  भी हुआ है ।  और गैर बराबरी का विष दलितों का दलितों से भी है। दलितों का पिछड़े से भी है। और तो और ब्राह्मणों का ब्राह्मणों से भी है....लगातार प्रमाणिक रूप से इस पर लिखना शुरू कर रहा हूं...यह कॉलम जारी रहेगा....

(दलित चेतना और सवर्ण)

28 जनवरी 2026

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…
अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अरुण साथी

दुनिया में राजतंत्र की समाप्ति के पश्चात लोकतंत्र का उदय हुआ। लोकतंत्र में वोट बैंक का सर्वोपरि महत्व स्थापित हुआ। तभी बाबा जी ने इस महत्व को भली-भांति समझते हुए एक अति-आधुनिक तथा अति-प्रगतिशील राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा को जन्म दिया। इसे वोट-तंत्र कहा गया। वोट-तंत्र में “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ।
यह सिद्धांत आर्यावर्त नामक राज्य में खूब फला-फूला। अनेक क्षत्रपों ने जातिवाद के इस मूल मंत्र को समझा, उसे व्यवहार में उतारा और देखते-ही-देखते राजा बन बैठे। इस सिद्धांत के अंतर्गत अधिक आबादी वालों ने पहले लघु आबादी वालों की भूमि छीनी, फिर उनकी नौकरियाँ छीन लीं और अंततः उनसे शिक्षा का अधिकार भी छीन लिया।

तब भी बहुजनों को संतोष न हुआ। होना भी नहीं चाहिए था। बहुजनों ने कहा कि एक हज़ार वर्ष पूर्व उनके साथ घोर शोषण हुआ था, जिसका प्रतिशोध लेना अनिवार्य है। इसी सिद्धांत के तहत लघुजनों से बोलने का अधिकार भी छीन लिया गया।

धीरे-धीरे यह अति-प्रगतिशील समाज और अधिक बहुजन-हितकारी होता चला गया। अंततः लघुजनों पर संसिया टैक्स लागू कर दिया गया।

इस व्यवस्था में सांस लेने पर कर (टैक्स) लगाया गया। जितनी बार कोई सांस लेगा, उतनी ही बार उसे कर अदा करना होगा। यह व्यवस्था बहुजनों को अत्यंत प्रिय लगी। इसे न्यायपूर्ण और नीतिसंगत घोषित किया गया। कहा गया कि पुरखों द्वारा किए गए शोषण की भरपाई के लिए इतना तो आवश्यक ही है।

बहुजनों ने उत्सव मनाया। संसिया टैक्स न देने वालों के लिए दंड का विधान किया गया। बकाया कर के लिए “प्रति टैक्स, प्रति कोड़ा” बहुजनों द्वारा लगाए जाने का प्रावधान निर्धारित हुआ।

इससे समस्त बहुजन आह्लादित हो उठे। वे अपने राजा की जय-जयकार करने लगे। अति-आधुनिक और अति-प्रगतिशील राजनीतिक सिद्धांत प्रदान करने वाले बाबा जी की सर्वत्र स्तुति होने लगी। हर ओर बाबा जी की पूजा-अर्चना आरंभ हो गई।

राज्य का नाम परिवर्तित कर नीला अम्बर कर दिया गया। सभी नीले वस्त्र धारण करने लगे, नीला टीका लगाने लगे। जो नीला टीका न लगाता, उसे दंडित किया जाता। उधर, गरीब और लाचार लघुजन धीरे-धीरे सांस लेना कम करने लगे। परिणामस्वरूप वे शीघ्र ही इस लोक को त्याग कर इश्लोक गमन करने लगे। कालांतर में इस धरा-धाम से लघुजन विलुप्त हो गए।

तत्पश्चात सभी बहुजन सुख, शक्ति और समृद्धि के साथ जीवन यापन करने लगे।

इति श्री रेवा-खंडे… अध्याय प्रथम… समाप्त…
प्रेम से बोलिए—बाबा जी जय।

24 जनवरी 2026

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो


संविधान ने जातिगत भेदभाव नहीं होने का अधिकार दिया है। पर हमारे देश के राजनीतिज्ञ जातिगत भेद भाव को वोट की राजनीति के तहत उपयोग कर समाज को बांटा रहे । इसमें कई नाम है। 1919 में अंग्रेजों ने काला कानून रॉलेट एक्ट लाया था। फिर मंडल आंदोलन में बीपी सिंह के बाद लालू यादव ने भूराबाल साफ करो का नारा दिया। मायावती ने तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का विष बेल बोया। इसी पर काम किया। 
बीजेपी और मोदी सरकार ने पहले sc, st ACT पर सुप्रीमकोर्ट का झूठे मुकदमे को देख दिया फैसला बदल कर वही किया। आज यह मुकदमा 95 प्रतिशत झूठा होता है।

अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने UGC के द्वारा पुनः जातिगत भेद भाव की लंबी लकीर खींच दी। 
अब विश्विद्यालय में पढ़ने वाले sc st और obc विद्यार्थी को पीड़ित मान लिया। और सवर्ण समाज को पीड़क, अत्याचारी, खलनायक मान लिया। यही नियम लागू किया गया। अब एक समिति बनेगी जो केवल आरोप लगाने भर से केवल सवर्ण  विद्यार्थी को दोषी माना जाएगा। समिति इसपर कार्रवाई करेगी। 

कॉलेज से निष्कासन, निबंधन रद्द, पुलिस में हवाले और जेल। मतलब, जिस किसी सवर्ण विद्यार्थी पर sc, st, OBC के द्वारा जातिगत भेद भाव का आरोप लगा, उसका जीवन सर्वनाश हो जाएगा। 


इतना ही नहीं, यही स्थिति कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रोफेसर पर भी लागू है । अब, गुरुजी भी इनसे डरे डरे रहेगें।


और यह काला कानून समानता का कानून के नाम पर लाया गया। पर इसमें पहले जांच का प्रावधान नहीं। इसमें झूठा आरोप लगाने पर कोई सजा नहीं...!


यह रोहित बोमिला के केस के बहाने हुआ। वही रोहित बोमिला जो कानूनी रूप से  sc साबित नहीं हुआ। उसकी आत्महत्या के कारण में जातीय भेदभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। यह सब नरेटिव बनाया गया। 


अब यूजीसी ने एक भयानक काला कानून थोप दिया है। अब बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने वोट बैंक के लिए बांटने का और बड़ा काम किया। 


यह क्यों हुआ..? यही होता है। नेता यही करते है। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक यही होता है। जो उनके साथ है नेता उसका महत्व नहीं देते। जो जितना प्रखर विरोध में होता है, उसे अपने साथ लाने का सारा जतन नेता करता है। 

यूजीसी के माध्यम से वही किया गया। जो कुछ sc और OBC बीजेपी का प्रखर विरोध करते थे, उसी को साधने के लिए यह किया।


अब जो बीजेपी के प्रबल समर्थक थे। जिनको भक्त कहके गाली दी जाती है, बीजेपी ने उन्हीं पर प्रहार किया। 

अब यह भी समझिए। Sc, st, OBC के विरुद्ध कोई अत्याचार हो। कोई कानून बने , तो कोई न कोई सवर्ण उसका विरोध करेगा। उनके साथ खड़ा होगा। अत्याचार का विरोध करते हुए अपने समाज से लड़ेगा। पर जब सवर्ण पर अत्याचार हो तो सारा का सारा गैर सवर्ण या तो प्रसन्न होगा या मौन साध लेगा।


अब देखिए। समाज के रहकर, कई बार sc के साथ अत्याचार का प्रखर विरोध किया। और पत्रकारीय यात्रा में कई ऐसे लोग को जानता हूं जो sc st ACT के तहत फर्जी मुकदमा करने के लिए प्रसिद्ध है। जरा सा पैसे के लालच में वह किसी पर मुकदमा करता है। क्या ऐसे लोगों की जांच नहीं होनी चाहिए। पर होता यह है कि मुकदमा करने के लिए उनको बिहार सरकार के द्वारा एक लाख तक सरकारी सहायता दी जाती है। 

स्थिति भयावह है। मतलब यह कि अब सवर्णों को इस देश में रहने, जीने का मूलभूत अधिकार तक  यह छीन लिया जाएगा...!

पूरे भारत में सवर्ण समाज 10 प्रतिशत होगा। मतलब अल्पसंख्यक। तब, अब एक ही उपाय बचा है। सारे सवर्ण समाज को उठा कर देश निकाला दे दो। उठा का समुद्र में फेंक दो। या  जब सवर्ण समाज आज भी इतना अत्याचारी है तो इसे भी किसी टापू पर भेज दो। वहीं यह जी लेगा...

#UGC_RollBack #UGCRegulations #UGC




21 जनवरी 2026

नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म में अपना अपना टार्गेट

नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म में अपना अपना टार्गेट

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नीट छात्रा की हत्या और दुष्कर्म मामले में  सभी ने अपना अपना टार्गेट सेट कर लिया है। आजकल, ईमानदार और साहसी होने के दावे हम स्वतः करते है। और हमेशा की तरह सोशल मीडिया में कुछ वाह वाही करते हैं तो कुछ गाली देते हैं। 
होना यह चाहिए था कि इस बड़े आपराधिक नेटवर्क को सामने लाने के लिए सारे उपाय किए जाते। साक्ष्य जुटाए जाते। हो यह रहा है कि कहानियां सुनाई जा रही। यहां तक कि छात्रा का चरित्र हनन किया जा रहा। और हो यह रहा कि सभी ने अपना अपना टार्गेट सेट कर किया है।  हो यह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का धज्जियां उड़ाते हुए व्यू और कमेंट के लिए छात्रा की पहचान, उसकी तस्वीर को उजागर कर दिया गया। 

 हद तो यह है डॉ सहजानंद को टारगेट में ले लिया गया है। जबकि उनकी सहभागिता जितनी होनी थी, वह एक सामान्य चिकित्सक के लिए उचित ही है। पर टारगेट करने का अपना टारगेट होता है। बस वह पूरा हो, यही टारगेट है..!

इस सबके बीच इसमें गर्ल्स हॉस्टल संचालक और मकान मालिक का अवैध और नैतिक नेक्सस, पटना में देह व्यापार में इनकी सहभागिता। इसके राजनीतिक संरक्षण और नेक्सस में राजनीतिक नेटवर्क पर बहुत कम तथ्य आ रहे। जबकि मूल यही है। और पटना से जुड़ा हर आदमी इसे जान, समझ रहा है। हालांकि दैनिक भास्कर ने इसे स्ट्रिंग ऑपरेशन में खुलासा भी किया। असल काम यही करने का है। 

अब आइए केस अनुसंधान पर। एसआईटी ने अपने अनुसंधान को गर्ल्स हॉस्टल से शुरू करके जहानाबाद पर केंद्रित किया है। मतलब, कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है। जिसपर सभी चुप है। 

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अब, सरकार और पुलिस की शाख पर प्रश्नचिन्ह है। पहले दिन से ही यह  लगा जैसे पुलिस अपराधियों के बचाव में हो। अब भी यही लोगों की धारणा है कि सब लीपापोती हो जाएगा। कोई बलि का बकरा बनेगा। 

यह सबसे चिंता का विषय है। इसका व्यापक असर बेटियों की शिक्षा पर पड़ेगा। कोई अपनी बेटी को पटना भेजना नहीं चाहेगा। 


गृह मंत्री सम्राट चौधरी का कोई प्रयास नहीं दिखता। बल्कि लोग मान रहे है कि यह नेताओं का भी नेक्सस है। इसीलिए नेता इसमें हरसंभव बचाव में ही काम करेगा।


नीलम अग्रवाल को छोड़ दिया जाना, बर्डेन का गुम हो जाना, बंगाल की लड़की का रहने का कथित दावा, दैनिक भास्कर अखबार के डिजिटल के स्ट्रिंग ऑपरेशन में गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियों का देह व्यापार में संलिप्त होने का नेक्सस... छात्रा के शरीर पर जख्मों के निशान, प्रभात हॉस्पिट में मामले को दबाने के लिए 15 लाख का ऑफर, कमरा को साफ किया जाना, कितने प्रश्न है, और उत्तर किसी का नहीं है। जवाब कौन देगा...

उम्मीद है, बिहार पुलिस के डीजीपी विनय कुमार, एडीजी कुंदन कृष्णन, एस आई टी और एसएसपी कार्तिकेय शर्मा इस गुत्थी को प्रमाण के साथ सुलझा कर बिहार की पुलिस से लोगों के टूट रहे भरोसे को टूटने से बचा ले...

06 जनवरी 2026

अरे, लल्लन टॉप, सौरभ द्विवेदी का नहीं था..!

जब कभी कोई कहता है कि समाज में अच्छे लोगों की कद्र नहीं । समाज उनको भूल जाता है। समाज बड़ा निष्ठुर है। तब समाज स्वयं आगे आकर इस बात को गलत सिद्ध करता है।  अभी लल्लन टॉप सौरभ द्विवेदी को लेकर भी यही हो रहा। जिसको देखिए, वही पूछ रहा। वही बता रहा। ऐसे थे। वैसे थे। गजब। एक दम लल्लन टॉप है। 
कोई आदमी कितना बड़ा है, यह इसी से तय होता है। आज लल्लन टॉप वाले सौरभ द्विवेदी  शिखर पर है। इसका प्रमुख कारण, एकपक्षीय पत्रकारिता के युग में इन्होंने संतुलन बनाए रखा। तराजू का पलड़ा किसी ओर कभी झुकता नहीं दिखा। 

और बस इसीलिए तो भरोसा नहीं हो रहा। सब तो इसलिए भी चौंक रहे की अरे 

ई लल्लन टॉप, सौरभ द्विवेदी का नहीं था...?

खैर, बस दो शब्द और

***

वह कौन शख्स है
जो एकदम फक्कड़ 
जैसा हंसता है...

और फिर झट से
चुप हो जाता है ऐसे 
जैसे रोते बच्चे को
मां मिल गई हो..

और देखिए तो
कैसे चौआनियाँ 
मुस्कान के साथ 
आहिस्ते से पूछ लेता है
किसी से भी 
कड़वा प्रश्न....

*****
वह कौन शख्स है
जो छोड़ गया सबको

किस लिए, यह किसी को
नहीं बताया उसने
पर सब जानना चाहते है
कारण...

कारण ही तो महत्वपूर्ण
होता उनके लिए
जो चिंता करते है उनकी
जो सबकी चिंता किया करता है...

और इसी लिए तो सब चिंतित
सौरभ के लिए...

(अरुण साथी)

05 जनवरी 2026

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू!
आपका नाम केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि उस चेतना का उद्घोष है जिसने परतंत्रता की बेड़ियों को चुनौती दी। बरबीघा थाना के सामने आपकी प्रतिमा का स्थापित होना किसी साधारण घटना का साक्ष्य नहीं, बल्कि इतिहास के मौन को स्वर मिलने जैसा है। यह प्रयास भले ही लघु प्रतीत हो, पर इसका भाव अनंत है, जैसे सूरज के सामने दीया जलाना, फिर भी आस्था के उजास से भरा।
जिस भूमि के लिए आपने अपना सर्वस्व अर्पित किया, उसी जन्मभूमि में आपको वह स्थान देर से मिला, जिसके आप सहज ही अधिकारी थे। यही विडंबना अक्सर हमारे समाज की नियति बन जाती है। जिस चौक को कभी बथान कहा गया, फिर अंग्रेजी सत्ता के दौर में थाना चौक के नाम से जाना गया, उसी चौक ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आपके कदमों की गूंज सुनी। धरना, प्रदर्शन और साहस की अग्नि में तपे आपके संघर्ष ने विदेशी सत्ता को चुनौती दी और वही चौक आपके नाम से पुकारा जाने लगा, लाला बाबू चौक।
इस नामकरण का प्रथम स्वप्न तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष शिवकुमार जी ने देखा। प्रतिमा स्थापना का शिलान्यास भी हुआ, पर राजनीति की उथल-पुथल में यह स्वप्न समय के धुंधलके में खो गया। उस अधूरे स्वप्न को मैंने आत्मसात किया। दो दशकों तक कलम के माध्यम से, अखबारों के पन्नों पर, आपकी स्मृति को जीवित रखने का सतत प्रयास करता रहा।

आज वह स्वप्न साकार हुआ। मंत्री अशोक चौधरी जी द्वारा शिलान्यास, पूर्व सभापति रोशन कुमार की पहल और अनेक हाथों के सामूहिक श्रम से आपकी प्रतिमा अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। राजनीति ने करवटें बदलीं, पर अंततः सत्य और स्मृति ने अपना स्थान पा लिया।

यह मेरे लिए राजनीति नहीं, श्रद्धा है। यह किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति कृतज्ञता का प्रश्न है। लाला बाबू, यह प्रतिमा नहीं, यह हमारी सामूहिक स्मृति का शिलालेख है। इस सद्कार्य में सहभागी सभी हाथों को साधुवाद, और आपको शत-शत नमन।

03 जनवरी 2026

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

अरुण साथी 

वागर्थ का दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने ऐसे सवाल उठा दिए हैं जो  बेचैन करता है...!

और यह बेचैनी तब और बढ़ जाती है जब  भीड़ की हिंसा में कथित धर्म के नाम पर मनुष्यता की मौत हो रही है। और यह बेचैनी और अधिक बेचैन करती है जब भीड़ की हिंसा में मरने वाले का धर्म जानकर कर दुख या आक्रोश व्यक्त करने का चलन चरम पर है। इसमें कोई बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास सहित कई हिंदुओं की मौत पर उबाल ले रहा तो वहीं अपने ही देश में भीड़ की हिंसा पर चुप्पी रखते है।

इसके ठीक उलट, भारत में मुसलमानों की भीड़ की हिंसा में मौत पर दुनिया भर में कोहराम मचाने वाले, बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर चुप्पी साध लेते है। और हिंसा तथा मौत का यह धार्मिकीकरण मनुष्यता को मारने का सबसे घातक हथियार बन गया है।

इसी में बांग्लादेश के क्रिकेटर रहमान को आईपीएल के अपने टीम में लेने पर शाहरुख देश द्रोही हो जाते है, तो बीसीसीआई और आईसीसी के प्रमुख जय शाह इस खरीद पर रोक नहीं लगाने पर भी देश भक्त बने रहते हैं। 

और यह भी , क्रिसमस में भारत में सर्व धर्म समभाव खत्म हुआ। दूसरे धर्म के प्रति असम्मान तीक्ष्ण हुआ। पर हम यह नहीं देखते कि कट्टरपंथ की राह चले, अफगानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान इत्यादि देश आज कहां हैं..?

****
अब जरा गौर करें। बिहार के नालंदा निवासी अतहर हुसैन साइकिल पर सवार होकर धूम धूम कर कपड़ा बेचते थे। नवादा में 5 दिसंबर को धर्म से घृणा की भेंट वे चढ़ गए। पीट पीट कर उनकी हत्या कर दी गई। यह मामला कितने लोगों को पता है...?

23 दिसम्बर को केरल के वलायर थाना क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के राम नारायण को भीड़ ने बांग्लादेशी कह कर पीट पीट कर मार डाला..!

26 दिसंबर को देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा को चीनी समझ कर हत्या कर दी गई...!

सूची लंबी है। पालघर में साधुओं की हत्या, अमृतसर में निगाहों द्वारा हिन्दू युवक की हत्या और वीडियो बना...! अंतहीन सिलसिला है। खैर अब पढ़िए इसे

...

उत्तर आधुनिकता, इस संदर्भ में वागर्थ के दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने कई प्रश्न उठाएं  हैं।

एक प्रश्न देखिए, 

"सत्यमेव जयते सत्य नहीं रह गया। हर बार जीतने वाला और जो सबसे कुशलता पूर्वक प्रचारित है, वह सत्य बन गया..?"

यह कितना बड़ा प्रश्न खड़ा किया है इन्होंने? 

"इतिहास को जब-जब राजनीतिक दृष्टिकोण से दोबारा लिखने की कोशिश होगी कुछ बिंदुओं पर अतीत के प्रति अंध श्रद्धा और कुछ बिंदुओं पर अतीत का विस्मरण या अतीत के महान हिस्सों का विस्मरण घटित होगा...?"

***
"इन दिनों सत्ताएं रामायण के बाली की तरह है। वे विपक्ष की शक्तियों का अपहरण कर लेती हैं। आमना-सामना होने पर विपक्ष का आधा बल हमेशा बाली के पास आ जाता था। आज वही वाली सिंड्रोम है..?"


यह प्रश्न तो अति गंभीर है, 

"उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद द्वारा लोगों का कैसा सांस्कृतिक आत्म हरण है कि मनुष्य कुछ खुद कुछ सोच नहीं पा रहा। वह किसी भी प्रचारित सूचना पर संदेह नहीं कर पा रहा....?"
बस, इस अंतिम पंक्तियों को कई बार पढ़ें। सोचें, क्या आप स्वयं कुछ सोच पाते है या नहीं...यदि हां तो ठीक है, यदि नहीं तो... सत्यानाश...


02 जनवरी 2026

बिहार में पुल का गिरना एक आंदोलन

बिहार में पुल का गिरना एक आंदोलन बिहार में तैयार होने से पहले ही पुल गिर रहे। रोपवे गिर रहा है और कुछ लोग खुश, तो कुछ चिंतित हो रहे। खुश होने वाले लोग ज्यादा है। चिंतित होने वाले कम। और भला खुश भी क्यों न हुआ जाए। कम से कम गिरते हुए पुल में इतना तो साहस है कि वह बगावत कर सके। वरना आज तो आदमी इतना साहस नहीं कर पाता। यह बगावत नहीं तो और क्या है? यदि यह बगावत नहीं होता तो पुल गिरता ही नहीं!
और पुल के गिरने पर उन लोगों की चिंता बढ़ जाती है, जिनकी संवेदना, नैतिक मूल्य गिर रहे है। और कमिशन बढ़ रहा। दरअसल , गिरता हुआ पुल इसी बात को लेकर आंदोलन कर रहा। खेलावन काका ने विश्वस्त सूत्रों के हवाले से समाचार निकाला है। समाचार यह है कि पुल के गिरने पर इसकी जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। समिति के सामने पुल हाजिर हुआ और बगावत का पक्ष रखते हुए कहा, बगावत तभी होती जब अति होता है। हर दिन कमीशन बढ़ रहा। इसका भार मेरे ऊपर ही आता है। ऐसे में यदि सब कुछ ठीक रहा तो पुल के गिरने से कई जाने जा सकती है। उन जानों की वजह में मेरी बदनामी होती। उसी बदनामी से बचने के लिए यह आंदोलन है। तैयार होने से पहले गिर कर सत्ता के कानों तक आवाज पहुंचना ही उद्देश्य है। उनको यह बताते हैं कि पुल गिरने में आपका ही एक मात्र योगदान है। अब यह अलग बात है कि यह आवाज वहीं से दबा दी जाती है। तब भी, हम अपना काम तो कर ही रहे।

आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना

आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना 

नववर्ष की दस्तक के साथ ही बरबीघा के श्री कृष्ण राम रुचि कॉलेज का मैदान सिर्फ एक खेल का स्थल नहीं रहता, वह स्मृतियों, मित्रता और मुस्कान का उत्सव बन जाता है। हर साल अपने मित्रों के साथ क्रिकेट खेलने का यह बहाना दरअसल जीवन की आपाधापी से कुछ पल चुराने का एक सुंदर उपक्रम होता है। जैसे ही बल्ला हाथ में आता है और गेंद हवा में उछलती है, वैसे ही चेहरे पर वर्षों पुरानी वही निश्छल मुस्कान लौट आती है।

मैदान पर उतरते ही समय अपनी गति भूल जाता है। घंटों हँसते-बोलते, एक-दूसरे की टाँग खींचते, कभी किसी की फील्डिंग पर ठहाके लगते हैं तो कभी किसी की ‘शानदार’ मिस-हिट पर पूरा मैदान हँसी से गूँज उठता है। यह सिर्फ क्रिकेट नहीं होता, यह मित्रता का पुनर्जन्म होता है—जहाँ औपचारिकताएँ टूट जाती हैं और दिल खुलकर बोलने लगता है।
यह खेल अपने आप में आनंद का झरना है। यहाँ तनाव पिघल जाता है, जिम्मेदारियों का बोझ हल्का हो जाता है और जीवन कुछ देर के लिए बेहद सरल लगने लगता है। काश, ऐसे पल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी सहजता से मिल पाते, पर ऐसा संभव अधिकतर मित्रता की गोद में ही होता है। मित्रों की वही टोली, वही अपनापन—यही इन पलों की असली पूँजी है, और इन्हें जीवित रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।
इन क्षणों में हम फिर से बचपन में लौट जाते हैं—जहाँ हार-जीत से ज़्यादा साथ होना मायने रखता है। हाँ, यह सच है कि अगले दो दिन शरीर दर्द से कराहता है, पर वह दर्द भी मीठा लगता है। क्योंकि वह याद दिलाता है कि हम आज भी हँस सकते हैं, खेल सकते हैं और ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। यही तो नए साल की सबसे खूबसूरत शुरुआत है और कुछ घंटे हम अपने तनाव को भूल जाते है...

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बेटा (लघु कथा)