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02 जनवरी 2026

आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना

आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना 

नववर्ष की दस्तक के साथ ही बरबीघा के श्री कृष्ण राम रुचि कॉलेज का मैदान सिर्फ एक खेल का स्थल नहीं रहता, वह स्मृतियों, मित्रता और मुस्कान का उत्सव बन जाता है। हर साल अपने मित्रों के साथ क्रिकेट खेलने का यह बहाना दरअसल जीवन की आपाधापी से कुछ पल चुराने का एक सुंदर उपक्रम होता है। जैसे ही बल्ला हाथ में आता है और गेंद हवा में उछलती है, वैसे ही चेहरे पर वर्षों पुरानी वही निश्छल मुस्कान लौट आती है।

मैदान पर उतरते ही समय अपनी गति भूल जाता है। घंटों हँसते-बोलते, एक-दूसरे की टाँग खींचते, कभी किसी की फील्डिंग पर ठहाके लगते हैं तो कभी किसी की ‘शानदार’ मिस-हिट पर पूरा मैदान हँसी से गूँज उठता है। यह सिर्फ क्रिकेट नहीं होता, यह मित्रता का पुनर्जन्म होता है—जहाँ औपचारिकताएँ टूट जाती हैं और दिल खुलकर बोलने लगता है।
यह खेल अपने आप में आनंद का झरना है। यहाँ तनाव पिघल जाता है, जिम्मेदारियों का बोझ हल्का हो जाता है और जीवन कुछ देर के लिए बेहद सरल लगने लगता है। काश, ऐसे पल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी सहजता से मिल पाते, पर ऐसा संभव अधिकतर मित्रता की गोद में ही होता है। मित्रों की वही टोली, वही अपनापन—यही इन पलों की असली पूँजी है, और इन्हें जीवित रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।
इन क्षणों में हम फिर से बचपन में लौट जाते हैं—जहाँ हार-जीत से ज़्यादा साथ होना मायने रखता है। हाँ, यह सच है कि अगले दो दिन शरीर दर्द से कराहता है, पर वह दर्द भी मीठा लगता है। क्योंकि वह याद दिलाता है कि हम आज भी हँस सकते हैं, खेल सकते हैं और ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। यही तो नए साल की सबसे खूबसूरत शुरुआत है और कुछ घंटे हम अपने तनाव को भूल जाते है...

04 अप्रैल 2023

वरुण धवन के पिता के इस जज्बे को सलाम

वरुण धवन के पिता के इस जज्बे को सलाम


कुछ दिन पूर्व ग्रामीण अभिभावक रवि दा के द्वारा बरबीघा के गोड्डी गांव निवासी एक बच्चे के पिता को मेरे पास यह कह कर भेजा की बच्चे को अच्छे निजी स्कूल में पिता पढ़ाना चाहते हैं परंतु आर्थिक रुप से गरीब है। इसलिए बरबीघा चौपाल द्वारा किसी भी विद्यालय में निशुल्क नामांकन करवा दीजिए। बच्चे का पिता रामाशीष कुमार भी आकर मुझसे मिले और Divine Light Public school में बच्चे का नामांकन कराने का निवेदन किया। वे पैर छूने लगे। मैं पीछे हटकर उनको तत्काल रोका। उसी समय अहसास हुआ की ये अपने बच्चे की पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर है। उनको भरोसा दिया। अगले ही दिन उनका कॉल भी आ गया। फिर मित्र सुधांशु शेखर जी से बात की वे सहर्ष तैयार हो गए। 

बच्चे के नामांकन होने की सूचना जब रामाशीष जी को दिया तो वे बेहद खुश हुए। मैंने पूछा की बच्चा स्कूल कैसे आएगा तो खुद बोले पड़े। 

"सर, नामांकन निःशुल्क हुआ है। फीस भी नहीं लगेगी। बच्चा को रोज साइकिल से स्कूल पहुंचा देंगे। और लेकर आएंगे। मजदूर आदमी है। बरबीघा में ही मजदूरी कर लेंगे। बेटा पढ़ लेगा तो पीढ़ी बदल जायेगी।"


आज बच्चा का नामांकन हो गया। बरबीघा चौपाल के सहयोग से अन्य जरूरतों को पूरा करने का भरोसा दिया। 


बच्चे का नाम नाम वरुण धवन, पिता रामाशीष कुमार। हर बात में जाति की दुहाई देकर एक वर्ग को अपमानित करने का आज का दौड़ है। जय भीम का नारा डराने लगा है। वैसे लोगों से कहता हूं, बच्चे की जाति किसी ने नहीं पूछी। मैंने भी नहीं।

17 सितंबर 2021

रिलायंस किराना दुकान और ईस्ट इंडिया कंपनी की फीलिंग

रिलायंस किराना दुकान और ईस्ट इंडिया कंपनी की फीलिंग

छोटे से कस्बाई शहर बरबीघा में भी रिलायंस स्मार्ट का किराना दुकान खुल गया। उसमें सब्जी, फल, मसाला, दूध, पनीर, घी, मक्खन से लेकर दाल चावल, बिस्कुट, चाय सभी कुछ उपलब्ध है।
निश्चित ही पूंजीवाद का यह एक सुरसा स्वरूप है। सब कुछ अपने कब्जे में कर लेने की कवायद दिखती है। यह ठीक वैसे ही मुक्तखोरी की बात होगी जैसे जियो मोबाइल। अब हर हाल में ₹200 महीना देना ही होगा। अनुभव लेने मैं भी गया। समान खरीद में आधा घंटा लगा तो बिल बनाने और चेक कर निकलने में एक घंटा।
बहुत कुछ जानकारी नहीं मिल सका पर बहुत भीड़ थी । शुभारंभ को लेकर। ₹16 किलो की भिंडी एक ₹9किलो। लहसुन ₹49 तो गोभी भी ₹49 प्रति पीस, चीनी 40 । बाजार से सस्ता । पता किया तो पता चला कि कंपनी का ही निर्देश है कि बाजार से हर कीमत पर सब्जी की कीमत कम रखना है। चाहे खरीद ऊंची कीमत पर ही क्यों ना हो।

छोटे व्यापारियों, फुटपाथ पर काम करने वाले, ठेला पर सब्जी बेचने वाले, ठेला पर फल बेचने वालों के पेट पर लात मारने की यह एक बड़ी कोशिश है। और इस कोशिश से भगवान भी गरीबों को नहीं बचा सकते। आखिर अम्बानी की कंपनी जो है!

एक जानकारी जो नोटिस में शायद ही किसी ने किया वह यह दे रहा हूं कि कोविड-19 में परदेस से पलायन कर अपने घर आए लोगों का एकमात्र रोजगार का साधन छोटा-छोटा किराना दुकान, सब्जी, फल दुकान बना और गांव, घर, शहर के गली मोहल्ले में किराना दुकान की भरमार हो गई। कमाई भले ही 10-50 हो पर इंगेज लोग हो गए। अब उन पर भी आफत आएगी।
उपभोक्ताओं को निश्चित ही पहली नजर में सामान सस्ता मिल जाएगा। परंतु 1 किलो भिंडी के लिए जब मॉल में लोग जाएंगे तो अतिरिक्त सामानों की खरीदारी का अतिरिक्त बोझ भी बढ़ेगा । ₹9 में 1 किलो भिंडी खरीदेंगे तो एक, दो दूसरों का सामान भी खरीद कर निकलेंगे और मुनाफा मेकअप हो जाएगा। यही फंडा पहली नजर में समझ में आया।

ग्राहकों को भी फायदा है। ठंडा और दूध छोटे से शहर में कीमत से अधिक वसूले जाते हैं। दूध ₹4 प्रति लीटर प्रिंट से अधिक दुकानदार लेते हैं । ठंडा में प्रति बोतल ₹5 एक्स्ट्रा अनिवार्य रूप से ठंडा के नाम पर लिया जाता है। यहां ऐसी बात नहीं है। इसका असर होगा। दुकानदारों को इसपे विचार करना चाहिए। एक दिक्कत जो आम तौर पे दुकानदार करते है वह कम वजन देने का है। यहां वह नहीं है। एक बात यह भी की दुकानदारों में गहरी चिंता है। शाम में सभी दुकानदार यहां समझने बुझने आ रहे। आखिर अब दैत्याकार किराना दुकानदार से प्रतिस्पर्धा है। रणनीति तो बदलनी ही होगी।

यहां पर एक बात नहीं होगी कि जब हम किसी ठेला से सब्जी खरीदते हैं तो उसके घर का चूल्हा जलता है। उसके बच्चे पढ़ते हैं। और उसके घर में खुशहाली आती हैं। परंतु जब हम यहां से खरीदेंगे तो देश के सारी पूंजी के 25 फीसद पर कब्जा करके बैठे चंद लोगों के पूंजी में ही हम इजाफा करेंगे। किसी का भला नहीं हो सकेगा।

कुछ-कुछ ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी फिलिंग होने लगी है। बात भी वैसा ही है। देश में पूंजीवादी सरकार है। गरीबों की सुनने की कोई बात बिल्कुल ही नहीं है और वर्तमान में कोई गांधीजी भी नहीं है जो स्वदेशी आंदोलन जैसा मुद्दा उठा सकें। यहां तो गरीबों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो जाती है।

आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और भूदान आंदोलन जैसे आंदोलनों ने सीलिंग से अधिक जमीन रखने वालों की जमीन पर कब्जा कर लिया। पूंजीवाद की सरकार में देश के 100 पूंजीपतियों के हाथ में 25 फीसद हिस्सा है । पर उसके कब्जे की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । पर एक न एक दिन गरीब के चूल्हे जब खामोश होंगे तो गरीब की आवाज भी बुलंद होगी। लोकतंत्र में माया फैलाकर बहुत दिनों तक इन आवाजों को दबाकर नहीं रखा जा सकता। रिलायंस किराना दुकान में फल, सब्जी बेचने का विरोध तो किया ही जाना चाहिए। परंतु ऐसा करेगा कौन...? जात, धर्म में बांटें लोगों के शोषण की आवाज भला अब कौन, क्यों और किसलिए उठाएगा...? जय श्री राम...

15 मार्च 2019

लोकतंत्र नहीं, लहर तंत्र है..

लोकतंत्र नहीं, लहर तंत्र है..

नवादा लोकसभा सहित कई क्षेत्रों से कौन उम्मीदवार होंगे अभी तक पता नहीं!! चुनाव में मात्र 25 दिन बचे हैं। जो नेता जी आएंगे वे कौन-कौन से गांव जा पाएंगे? सोच कर देखिए! गांव अगर जाएंगे भी तो क्या वे किसानों का दर्द सुन सकेंगे? क्या गांव के लोग उनको बता सकेगें कि पीने के लिए पानी नहीं है। खेतों में सिंचाई का कोई साधन नहीं है। गांव की सड़क नहीं है। नेताजी के पास इतनी फुर्सत भी नहीं होगी।

मोदी लहर में शायद सब कुछ डूब जाएगा। महागठबंधन के तरफ से भी प्रत्याशी तय नहीं है। यह लोकतंत्र नहीं लहर तंत्र में बदल गया है। जिसे ऊपर से तय करके भेजा जाएगा मजबूरन आप से वोट दीजिए।

प्रत्याशियों को जांचने-परखने, सुनने-समझने, बोलने-बतियाने तक का समय आपको नहीं दिया जाएगा। यह कैसा लोकतंत्र है।

परंतु इस सब के लिए दोषी हम वोटर ही हैं। धर्म, जाति, उन्माद इसी सब पर वोट देना है। रोटी, रोजगार, महंगाई इन सब मुद्दों से कोई मतलब नहीं है। ना तो नेताजी को मतलब है और ना ही जनता को।