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05 जनवरी 2026

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

लाला बाबू!
आपका नाम केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि उस चेतना का उद्घोष है जिसने परतंत्रता की बेड़ियों को चुनौती दी। बरबीघा थाना के सामने आपकी प्रतिमा का स्थापित होना किसी साधारण घटना का साक्ष्य नहीं, बल्कि इतिहास के मौन को स्वर मिलने जैसा है। यह प्रयास भले ही लघु प्रतीत हो, पर इसका भाव अनंत है, जैसे सूरज के सामने दीया जलाना, फिर भी आस्था के उजास से भरा।
जिस भूमि के लिए आपने अपना सर्वस्व अर्पित किया, उसी जन्मभूमि में आपको वह स्थान देर से मिला, जिसके आप सहज ही अधिकारी थे। यही विडंबना अक्सर हमारे समाज की नियति बन जाती है। जिस चौक को कभी बथान कहा गया, फिर अंग्रेजी सत्ता के दौर में थाना चौक के नाम से जाना गया, उसी चौक ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आपके कदमों की गूंज सुनी। धरना, प्रदर्शन और साहस की अग्नि में तपे आपके संघर्ष ने विदेशी सत्ता को चुनौती दी और वही चौक आपके नाम से पुकारा जाने लगा, लाला बाबू चौक।
इस नामकरण का प्रथम स्वप्न तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष शिवकुमार जी ने देखा। प्रतिमा स्थापना का शिलान्यास भी हुआ, पर राजनीति की उथल-पुथल में यह स्वप्न समय के धुंधलके में खो गया। उस अधूरे स्वप्न को मैंने आत्मसात किया। दो दशकों तक कलम के माध्यम से, अखबारों के पन्नों पर, आपकी स्मृति को जीवित रखने का सतत प्रयास करता रहा।

आज वह स्वप्न साकार हुआ। मंत्री अशोक चौधरी जी द्वारा शिलान्यास, पूर्व सभापति रोशन कुमार की पहल और अनेक हाथों के सामूहिक श्रम से आपकी प्रतिमा अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। राजनीति ने करवटें बदलीं, पर अंततः सत्य और स्मृति ने अपना स्थान पा लिया।

यह मेरे लिए राजनीति नहीं, श्रद्धा है। यह किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति कृतज्ञता का प्रश्न है। लाला बाबू, यह प्रतिमा नहीं, यह हमारी सामूहिक स्मृति का शिलालेख है। इस सद्कार्य में सहभागी सभी हाथों को साधुवाद, और आपको शत-शत नमन।

02 अगस्त 2025

संस्थाओं को इसी तरह मार दिया जाता है...!

संस्थाओं को इसी तरह मार दिया जाता है...! 
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और उनकी पत्नी के नाम पर बरबीघा के शिक्षाविद एवं स्वतंत्रता सेनानी लाला बाबू ने  बिहार केसरी की मर्जी के विरुद्ध कॉलेज की स्थापना की। इसमें जनसहयोग भी रहा। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक में जानबूझ कर इस कॉलेज को खत्म कर देने की स्थिति बना दी गई । या कहें, इसे धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ दिया गया।


स्थिति इतनी भयावह हो गई कि कॉलेज का भवन खंडहर बन गया। पढ़ाई के नाम पर सब कुछ शून्य हो गया। कुव्यवस्था ऐसी हो गई कि कोई किसी की सुनने वाला नहीं रहा।
मुझे तो कुछ माह पहले जानकर आश्चर्य हुआ कि एक प्राचार्य वर्षों तक प्राचार्य कक्ष में नहीं बैठे। वही कक्ष, जो कभी कॉलेज की आन-बान-शान हुआ करता था। जब हम लोग पढ़ते थे, तब उस कक्ष में जाने का साहस किसी का नहीं होता था।


प्राचार्य कक्ष में बिहार केसरी की एक अनुपम तस्वीर लगी रहती थी। वहीं लाला बाबू की भी एक भव्य तस्वीर होती थी। धीरे-धीरे इन प्रतिमाओं को भी किनारे कर दिया गया।


खंडहर हो चुके कॉलेज को लेकर कई बार चिंता जताई गई, लेकिन कुछ भी नहीं बदला। अब नवप्राचार्य के रूप में नवादा जिला के कटौना निवासी डॉ. संजय कुमार ने पदभार संभाला है। आज जब उनसे मिलने कॉलेज गया तो रास्ते में ही बदलाव की झलक दिख गई । कॉलेज के आसपास की झाड़ियाँ साफ की जा रही थीं, और बिहार केसरी की क्षतिग्रस्त प्रतिमा स्थल का पुनर्निर्माण हो रहा था।
डॉ. संजय कुमार से मिलकर लगा कि वे बदलाव के बड़े वाहक बनने का साहस कर रहे हैं। इसके लिए सभी का समर्थन भी मांग रहे हैं। उम्मीद करता हूँ कि वे इस धरोहर को पुनर्जीवित करेंगे।