14 अक्टूबर 2011

लंगड़ा रे घोड़ी चढ़में की नै। उर्फ आओ पीएम पीएम खेले (व्यंग)



अरूण साथी
शेखपुरा, बिहार


पीएम की कुर्सी क्या हुई मुआ पंडितजी की घोड़ी हो गई, जो-सो, जहां-तहां चढ़ने को बेताब है। मुई घोड़ी तो घोड़ी ठहरी, कोई चढ़ा नहीं की बिदक भी जाती है।

सब जगह भगदड़ मची है। एक तो आधी जान की घोड़ी और उस पर पंडितजी की सवारी, गोया पंडित जी जबसे चढ़े है उतरने का नाम ही नहीं लेते।(वैसे जो भी चढ़ा है वह राजी से उतरना नहीं चाहता) कई अपने भी इस उम्मीद में मुई घोड़ी को टंगड़ी मार रहे हैं कि वह पंडित जी को पटक दे और उनका नंबर आ जाए। इसी कोशीश में ऐ जी, ओ जी, लो जी, सुनो जी, सब हथकंडा लगा दिया पर राम राम, पंडित जी घोड़ी पर से उतने के बजाय नाक पर रूमाल बांध, दे चाबुक की ले चाबुक-सरपट घोड़ी भगा रहे है।

और, अब विरोधी सब भी बैखला गए हैं। सोते-जागते, पीएम-पीएम खेल रहे है। कभी किसी को पीएम का सपना आ जाता है तो कभी कोई किसी को पीएम का सपना दिखा देता है। मुई भुखी, प्यासी और बिमार घोड़ी पर चढ़ने के लिए पता नहीं सब कब से हंफिया रहें हैं। कहीं कोई अधवैस (युवा) दलित भोजनम् का जाप करते हुए दलित के घर भोजन (सुखी रोटी या फिर माड़-भात नहीं) करते हुए गुनगुना रहा है-
घोड़ी पर चढ़के सवार, 
आया है दुल्हा यार, 
कमरिया में बांधे भ्रष्टाचार....
सब जैसे जबरदस्ती के बराती बन, जय हो, जय हो भज रहे हैं।
और उधर रथ लेकर निकले रूठे महाशय चौरासी की उम्र में घोड़ी पर चढ़ने को बेताब हैं।  कई बार असफल रहते हुए नाक मूंह तुड़बाने के बाद भी गुनगुना रहे-
अभी तो मैं जवान हूं, 
अभी तो मैं जवान हूं। 
मोती कुछ न बोलना, 
मुंह न अपनी खोलना। 
सांस जरा थम तो ले, 
मंदिर जरा हम तो ले....।

ओह, मुई घोड़ी की नन्ही जान और लाख आफत। जब रेस ही लगी हो तो कौन चूकेगा। सो मत चूको चौहान की तर्ज पर सबके साथ तीन टांग वाला लंगरू नाई भी रेस में है। उसके पास भी सबका माथा मूंड़ने का पुराना अनुभव है। उसे आश है कि चार टांग वाले जब सब आपस में लड़-भीड़ रहे है तो शायद उसे मौका मिल जाए। सेठ करोड़ी मल उसे बार बार ललकारता भी रहता है-लंगड़ा रे घोड़ी चढ़में की नै। लंगड़ा रे घोड़ी चढ़में की नै। जय हो।

12 अक्टूबर 2011

पैदा करने वाली मां ने जिंदा बेटी को कफन देकर फेंका, 9 बेटी की मां नें उसे अपनाया।


शेखपुरा (बिहार)

बरबीघा रेफरल होस्पीटल के पीछे एक नवजात शिशु (बेटी) को लाल रंग का कफन ओढ़ा कर जिंदा ही झाड़ी में फेंक दिया गया और वहां से गुजर रही एक महिला को जब नवजात के रोने की आवाज सुनाई दी तो उसने उसे उठा लिया। मामला मंगलवार की रात्री आठ बजे के आस पास की है। मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली इस घटना में जहां जन्म देने वाली मां ने बेटी जानकार नवजात शिशु को जन्म देने के बाद लाल रंग के कफन में लपेट कर ढकनीया पोखर के पास झाड़ी में फेंक दिया वहीं मानवता की मिशाल पेश करते हुए नालान्दा जिले के सारे थाना अर्न्तगत हरगांवां निवासी उषा देवी ने उसे गोद ले लिया। उषा देवी को पहले से ही नौ बेटी है और उसके बाद भी उसने फेंकी हुई बेटी को गोद लेकर मिशाल पेश की है। फेंके हुए नवजात को गोद लेने वाली उषा देवी बच्ची के फेंके जाने पर आक्रोश व्यक्त करती हुए कहती है कि बेटा हो या बेटी बच्चे भगवान के सामान है और समाज और दहेज के डर से ऐसा करना सबसे बड़ा पाप है।

02 सितंबर 2011

अन्ना, मीडिया बनाम एलीट बुद्धिजीवी


अन्ना हजारे को लेकर मीडिया के कवरेज पर आज कल सवाल उठाए जा रहे है और इसकी गूंज संसद से लेकर सड़क तक देखने को मिल रही है। कल आईबीएन 7 पर इसको लेकर बहस भी कराई गई अन्य चैनलों और अखबारों के संपादकीय में यह मुददा बहस का विषय बना हुआ है। इन्हीं सवालों को लेकर मेरा मन भी कई दिनों से मथ रहा है और आज एक आम पाठक और दर्शक के रूप में मैं भी इन सवालों के जबाबों में उलझना चाहता हूं। सबसे पहले मैं चैनलों की बात करू तो अन्ना के आंदोलन के पूर्व चैनलों पर खुले आम सरकार के हाथो बिके होने का आरोप कथित बुद्विजीवी लगाया करतेे थे और जब भटटा परसोल में राहुल को कवरेज मिलती थी तो लगता भी ऐसा ही था और आम तौर पर मेरे जैसे दर्शक चैनल पर इस तरह की खबर आने पर रिमोट का सहारा ले लेते थे। पर अन्ना का आंदोलन की परस्थितियां इससे विपरीत थी। कुल मिला कर तेरह दिन में सोना-जागना अन्ना के आंदोलन के न्यूज को देखते हुए हुई। जब कभी भी किसी भी चैनल पर विज्ञापन अथवा अन्य खबर आई फिर से रिमोट का सहारा लिया और अन्ना की तलाश होने लगी। अपने कार्यालय में चंदा कर डीजल लाया और दिन दिन भर अन्ना का न्यूज देखता रहा। मैं ही नहीं मेरे साथ कई कई लोग अपने काम धंधे को छोड़ कर इस कार्य में जुटे रहे। यह जन भावना थी और इसी जन भावना को समझते हुए समाचार चैनलों ने अपनी जिम्मेवारी निभाई। कभी कभी तो ऐसा हुआ कि कई चैनलों पर विज्ञापन एक साथ आए तो फिर अन्ना की तलाश मे विजनस चैनल तक चला जाता जहां अन्ना ही दिखाया जा रहा था। 

इस कड़ी में मैं एक बाकया बताना चाहूंगा। बारहवे दिन जब संसद में बहस चल रही थी तब केबुल मे कुछ तकनीकी गड़बड़ी आ गई और प्रसारण कुछ देर के लिए रूक गया तो मेरे मित्र मनोज कुमार सहित कई लोगो को मोबाइल मुझे आ गया कि क्या हुआ, क्योंकि मेरा कार्यालय केबुल प्रसारणकर्ता कार्यालय के पास ही है। और मुझे जबाब देना पड़ा। ऐसा क्यों हुआ। क्यांेकि घरों में भी सपरिवार लोग अन्ना के साथ बैठे थे। मेरी बीबी आम गृहणी है। धरेलू महिला। आम दिनो मे वह सास बहू के सिरीयल को लेकर झगड़ जाती और घर मे न्यूज चैनल देखना दुभर हो जाता पर इन तेरह दिनो मे मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ?

यह एक सहज जन उभार का परिचायक है। अन्ना ने आम आदमी के दर्द को हवा दी और वह भी किसी महापुरूष की तरह नहीं, आम आदमी बन कर। अन्ना मंे लोगों को अपना चेहरा दिखा। वहीं सादगी, वही भदेशीपन! 

कल आशुतोष ने कहा कि मीडिया पर आरोप लगता है कि अन्ना को महापुरूष बना दिया और जबाब भी आशुतोष ने ही दिया कि मीडिया तो बाबा रामदेव से लेकर राहुल तक को फूल कवरेज दी वे क्यों नहीं महापुरूष बन गए? देहात में एक कहावत है दूध माफीक ही पानी मिलाया जाएगा। मतलब एक लीटर दूध में आप आधा लीटर पानी मिला सकते है पांच लीटर नहीं। वहीं बात मीडिया पर लागू है लोगों की भावनाओं को समझ मीडिया ने दूध में हिसाब से कुछ पानी उसमे मिलाया।

मुझे याद है जब आशुतोष ने एंकर की सीट से बोलते हुए कहा कि रामलीला मैदन में घटने वाली इस ऐतिहासिक घटना का मैं भी गवाह बनना चाहता हूं और अगले दिन वह रामलीला मैदान में माइक थामे नजर आए और देखने वालो को यह फर्क समझ में नहीं आ रहा था कि स्टूडियो में गोरा चिटटा, बेल मेंटेन दिखने वाला यह आदमी काला कलूटा क्यों दिख रहा है? कमर पर हाथ रखे जब आशुतोष बोल रहे थे मुझे लग रहा था जैसे दिन भर लहलहाती धूप मे हल जोतने के बाद कमर पर हाथ रख कर किसान थोड़ी देर के लिए सुस्ताना चाहता हो।

आईबीएन 7 की ही एक महिला रिर्पोटर ने चिलचिलाती धूप से बचने के लिए जब दुप्पटे को आंचल बना, सर पर रख एंकरिंग की तो ऐसा लग रहा था मानो धान की खेत में रोपनी रोपा रोपते हुए कजरी गा रही हो- सखी हे आइल देश के बरिया अब तो छोड़हो दिहरिया (चौखट) न....।

कुल मिला कर अन्ना के आंदोलन के कई निहितार्थ है जिसमें सबसे बड़ा यह कि आम आदमी को अन्ना के रूप में अपनी छवि नजर आती है। वहीं सांसद शरद यादव अन्ना और उनकी टीम पर व्यंग करते है और अरूंधंति राय और अरूणा राय सरीखे एलीट बुद्धिजीवी अन्ना पर सवाल खड़े करते है तो साफ झलक जाती है कि एक सातंवी जमात पास बुढा आदमी कैसे इन एलीटों से आगे चला गया। शरद यादव सरीखे कथित संपूर्ण क्रांति की उपज को खोर खोर कर खाने वाले नेताओ को भी लगता है कि इतने दिनो की राजनीति में भीड़ इक्कठा करने के लिए उन्हें भाड़े के लोग जुटाने पड़ते है पर रामलीला मे अन्ना के साथ लोग भुतियाल है।

हुर्रहुर्र की राजनीति करने वाले लालू जी के लिए तो प्रख्यात कवि अरूण कमल की यह रचना ही श्रेष्यकर रहेगी-

असत्य के प्रयोग?

किसने सोंचा था वह इस तरह जायेगा
कहता था मैं कौआ का मांस खाकर आया हूं
मरूंगा नहीं मैं इसी जगह राज करूंगा पूरा कलयुग
थर्र कांपता था पूरा ईलाका
दरोगा से मंत्री तक सब उसके जूते की गंध से पाते थे होश
बिना मंुडेर वाली छत से वह दिन भर मूतता रहता
आते जाते किसी भी आदमी के सिर पर खल खल 
ऐसा प्रताप था उसका
यही अर्थ था उस युग में न्याय का
और एक दिन
एक दिन मंुह अंधेरे जब बूढ़ी औरतें
जा रही थी गंगा नहाने भजन गाते टोल में
भागी चिल्लाते रोते कलपते
वह गिरा पड़ा था औधा गली में
रात में
आदतन उठा होगा मूतने 
मूतते मूतते बढ़ता गया होगा बिना मंुडेर की छत पर
और गिरा होगा भक्क मूतते अचक्के
अपने ही खून और पेशाब से डूबा
पड़ा है बीसवीं शताब्दी का एक और अजूबा।

इतिश्री

26 अगस्त 2011

अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा?-राहुल


लो जी, कांग्रेस के तथाकथित युवराज ने आखिर कर मंुह खोल ही दिया पर वही तोंता रटंत? बेचारे को जो सिखाया पढ़ाया गया उसे ठीक से पढ़ कर और याद कर संसद में रखा और कह दिया कि अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा?

बेचारे को कौन बतलाएगा कि यही आन्दोलन है तो लोकतंत्र जिंदा है वरना उनके दादी ने इसे मारने के लिए कोई कोर कसर उठा नहीं रखी थी।

मुझको तो इस सब में राहुल को प्रोजेक्ट करने की बू आ रही......

पर मीडिया का कैमरा सामने आते ही बेचारे लंगोटी उठा कर भागने लगते है, पता है तोंता रटंत के आलावा भी कुछ बोल न दे...

जय हो, जनाब  को भावी प्रधानमंत्री कहा जाता है.. भगवान भला करे इसे देश का...

24 अगस्त 2011

निर्लज हो तुम...


निर्लज हो तुम...

इतने हील हुजज्त के बाद भी हमारे प्रधानमंत्री को अन्ना से बात करने की फुर्सत नहीं है! आज की सर्वदलिये बैठक के बाद तो एक बात साफ हो गई कि इस देश को लूटने में सभी बराबर के भागीदार है। सबसे दुखद तो यह कि जब देश जल रहा है सरकार की मुखीया विदेश में और उनका लाडला तथाकथित युवराज और भावी प्रधानमंत्री आंचल में मुंह छुपाये सो रहा है। शर्म करो।


निर्लज हो तुम
लोक लाज सब धो कर
पी गए हो..
चुल्लू भर पानी भी
कम है अब
तेरे डूब मरने के लिए...

अरे एक बुढ़ा-नैजवान
जान को लगाकर दांव पर
भारत मां की लाज बचाने
बैठा है
भूखा
कई दिनों से...

और तुम,
तुम सरकार हो
इसलिए
बैठकों में फांकते हो काजू...

और
दाबते इफ्तार के साथ साथ
प्रजातंत्र को चबा चबा कर निगलना चाहते हो

और तुम
अब जबकि
सारा देश
मां की आबरू रक्षार्थ
उठ खड़ा हुआ है
उनकी अस्मत पर आज भी
हाथ डालने से गुरेज नहीं करते.......

12 अगस्त 2011

अथ साष्टांग आसन कथा----(चुटकी)

साष्टांग आसन बहुत ही लाभप्रद और फायदेमंद है और इस आसन को आजमा कर कई लोग फर्श से अर्श तक पहूंच गए है। इस आशन के बारे में अभी बाबा देव ने किसी दूसरे को बताया ही नहीं, बस स्वतः ही आजमाते रहे और कांग्रेस से भी इस आसन को करबाते रहे।

अभी अभी जब बाबा सलबार सूट में दिखे तभी मैं समझ गया कि ऐसा क्यों हुआ। दरअसल इससे पहले बाबा साष्टांग आसन को आजमा रहे थे पर जैसे रही उन्होंने इस आसन का त्याग किया परिणाम कष्टदायक हो गया।

आसन के तरीके
सबसे पहले गहरी सांस ले और झूठ-मूठ का परेशानी अपने चेहरे पर ओढ़ ले। इसके बाद जिस किसी के पास इस आसन का प्रभाव छोड़ना है उसके सामने अपनी कमर नब्बे डिग्री पर झुका ले!

लाभ
कलीकाल में यह आसन काभी फलदायक सिद्ध होता है और सभी बिगड़े काम बनते चले जाते है। इसके फल से उच्च शिखर की प्राप्ती बिना किसी कर्म के ही हो जाती है।

उदाहरण
वैसे तो इसके कई उदाहरण आपको अपने आस पास मिल जाएगे और इतिहास में इसके कई उदाहरण है पर वर्तमान मे अपने मोहन बाबा इस आसन को आजमा कर कहां है सबको पता है।

नोट- 
कमर सीधी रखने वाले लोग आज कल पसंद नहीं किए जाते और अन्न, केजरीबाल, बेदी और भूषण सरीखे लोग इसलिए सरकार की आंख की किरकिरी बने हुए है।

निष्कर्ष
इस युग मे कमर सीधी रखने वाले बिरले ही मिलते है और कहा जाता है कि ईश्वर आज इसी रूप में धरती पर बास करते है।