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19 अक्टूबर 2026
खानदानी
खानदानी
खदेरन बाबू गाँव के बड़का जमींदार थे। अंग्रेजों के सबसे प्रिय। अब सरकार ने जमींदारी छीन ली थी, पर ठसक नहीं छीन सकी थी। उनका भरा-पूरा परिवार था। अब जमींदारी के नाम पर बस हवेली बची थी। वह भी ढह-ढनमना रही थी।
इतनी उम्र में पहली बार खदेरन बाबू अंदर से व्यथित थे। आज उनकी इस हवेली में पंचायत बैठी थी। आज गोबर राम मुखिया है। अब वही न्याय भी करेगा।
मुखिया के बगल में एक युवक बैठा था। गुस्से से लाल, तमतमाया हुआ।
“हमरो कोर्ट-कचहरी देखल हइय। सहूलियत से हमर हिस्सा दे दहो। हमरो देह में तोहरे खून दौड़ रहलइ हें।”
बगल में हाथ जोड़े, सिर झुकाए एक महिला खड़ी थी। मंगली।
पुरानी बात है। वह पंद्रह साल की रही होगी। माय के साथ चौका-बर्तन में हाथ बँटाने हवेली आती थी। एक दिन खदेरन बाबू ने उसे एक कमरे में खींच लिया।
वह चीखती-चिल्लाती, विलाप करती रही।
घर आकर माय को बताई। माय ने चुप करा दिया।
तब से वह ऐसी चुप हुई कि लोग उसे गूँगी समझने लगे।
तब से वही कमरा, वही खदेरन बाबू, वही हवेली।
बस, अब चीखना-चिल्लाना सिसकियों में बदल गया था।
फिर वही कमरा मंगली का घर हो गया। अब मंगली का नाम रखेलनी हो गया।
आज इस मंगली का बेटा अपना हिस्सा माँग रहा था।
मुखिया ने समझाया,
“घर के बात घर में रह जइतो, खदेरन बाबू। भले बियाह नइ कइलहो, बेटवा तो तोरे हो। समझो कि तीन बेटा हो। नइ तो खानदान के नाक कट जइतो। आजकल कानून बड़ी कड़ा हो गेलइ हइ। जेल भी जाय पड़तो, उ अलगे।”
खदेरन बाबू ने सहमति में सिर हिला दिया।
कागज बना। तीसरा हिस्सा मंगली के नाम हो गया।
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