जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया
अभी डांडिया का चलन है। अचानक यह बढ़ा है। गुजरात से महानगर। और अब बिहार के कस्वा से लेकर गांव तक। सभी जगह। इसे बाजारवाद का प्रभाव माना जाता है। और यह है भी । तब भी, खराबी क्या है? आज पूंजीवादी व्यवस्था में हम सभी तो बाजारवाद के प्रभाव में हैं ही। हमारा राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक, सभी आयोजन बाजारवादी है। यह एक सच्चाई ही है।
अभी अचानक एक दिन सोच रहा था। एक दशक पहले तक दिल्ली जाने में रेलवे स्टेशन पर बोतल में पानी भरकर रेलगाड़ी पकड़ने दौड़ते थे। पानी भरने के लिए आपाधापी। एक कान रेल की सीटी पर रहता था। और आज? बाजारवाद ने ऐसा प्रभाव डाला कि हजार, पांच सौ का पानी ही पी जाते। उसने में भी नकली भी। कहा गया कि बीमारी का खतरा कम होगा, पर आंकड़े कहते है, बीमारी बढ़ गई। खैर, बाजारवादी डांडिया में भी खुशी की तस्वीर मिलती है।
खुशी, एक तो वह खुशी; जो हमारे जीवन में नहीं है। उसे हम अब इसी तरह के आयोजनों के माध्यम से सबको अपने खुश होने को प्रचारित करते है। सेल्फी में मुस्कुराते है। रील में डांस करते है। हंसते है। बाकी तनाव, अवसाद, कुंठा, प्रतिस्पर्धा तो जीवन में है ही
दूसरा वह, जो अंदर से खुश है। जो अंदर से खुश है। बस खुश है। चैतन्य। पर बहुत कम। एक चित्र में एक बच्चा अपने माँ के साथ डांडिया खेल रहा है। पिता वीडियो बना रहा। बस, इतनी सी खुशी। और सच्चिदानंद।
बाकी अभी डांडिया में एक महिला के देह का चित्र हम पुरुष नैतिक ज्ञान बांटते हुए अपने वॉल पर चिपका रहे। मैं सोचता हूं, कि अश्लील रिल्स बनाने वाली महिलाओं का वीडियो करोड़ों लोग देखते है। वह देखने वाला कौन है..? महिला तो देखती नहीं...? फिर यह ज्ञान देने वाले कौन है..? दोहरा चरित्र..! बस, इतना ही। बाकी सब ठीक है.. हां, अपने यहां रोटरी क्लब के द्वारा आयोजित संयमित डांडिया में मित्रों के आग्रह पर आधे मन से मैं भी गया। फोटो सेशन भी है..बाकी जगह तो हुड़दंग भी होता है...
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