16 दिसंबर 2015

अपने जनाधार मजबूत करने में जुटी महागठबंधन की पार्टियां

बिहार चुनाव परिणाम के बाद विपक्षी पार्टियाँ जहाँ निराशा के दौर से उबर नहीं सकी है वहीँ सत्ताधारी पार्टियाँ अपने अपने जनाधार मजबूत करने में जुटी है। इस वजह से कोंग्रेस, राजद और जदयू लगातार लोकलुभावन वादे कर रही है। तीन पार्टीयों के इस होड़ की वजह से बिहार की जनता को भविष्य में कुछ अच्छी और जनोपयोगी योजनाएँ मिलने की उम्मीद बढ़ गयी है।

अपने जनाधार को लेकर सबसे तेज और सटीक फैसला बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने ली। उन्होंने बिहार में पूर्ण शराब बंदी की घोषणा कर दी। उनके इस फैसले ने बिहार में एकबारगी लोगो  में यह सन्देश दिया की बिहार सरकार काम करेगी। नीतीश कुमार हमेशा अपने चुनावी वादे "नीतीश निश्चय" को दुहरा रहे है जिससे यह सन्देश जा रहा है की वो अपने सभी चुनावी वादे पुरे करेंगे।

इसी तरह कांग्रेस भी कहीं से पीछे नजर नहीं आ रही है। खास कर प्रदेश अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी लगातर मीडिया के माधयम से लोगों को अपने कामों की जानकारी दे रहे है। उनके द्वारा युवाओं और छात्रों को लुभाने और नया बिहार बनाने की असीम संभावनाएं है। इस अवसर को समझते हुए वो काम कर रहे है। खास कर मैट्रिक परीक्षा में कदाचार रोकने की बात कह कर वो इसे चुनौती के रूप में लेने की बात कही। इसके बाद सीबीएसई के तर्ज पर सभी परीक्षार्थी को ईमेल पे एडमिट कार्ड भेजने की योजना भी इसी कड़ी का हिस्सा है। इसी के साथ आईटी सेक्टर के माध्यम से कंप्यूटर शिक्षा की बात कहकर उन्हों युवाओं को एक उम्मीद दी है।

वहीँ तेजप्रताप और तेजस्वी यादव भी लगातार जनसम्पर्क कर लोगों से तेजी जुड़ रहे है। तेजस्वी यादव निर्माण कार्य स्थल पे पहुँच कर अपने कार्यशैली से अवगत कराना चाहते है।

हालाँकि राजद नेताओं के कार्यशैली को लेकर दवा व्यवसायियों में एक भय का वातावरण भी बना है। इसमें कुछ सच तो कुछ अफवाह का भी योगदान है। दवा व्यपारी अंदर अंदर इस बात को हवा दे रहे है की दवा गोदामों मे छापेमारी दबाब बना कर मैनेज कराने की कोशिश है। हालाँकि इसका दूसरा पक्ष भी काफी मजबूत है जिसमे नकली और एक्सपायरी दवाओं पे अंकुश लगाना जरुरी बताया जा रहा है।

कुल मिला कर बिहार  की नयी सरकार में शामिल पार्टियां अपनी कार्यशैली और योजनाओं से जनता को प्रभावित करने की कोशिश कर रही। इसका मुख्य कारन गठबंधन पे भरोसा न करते हुए आज न कल इसके टूटने की संभावना को ही माना जा सकता है। खैर, इसी होड़ की वजह से यदि जनोपयोगी कार्य हो जाते है तो बिहार अपनी बदनामी से एक कदम ही सही, आगे तो बढ़ेगा।

14 दिसंबर 2015

दहेज़ लेकर खर्चने में कैसी शान?

आज कल शादियों का मौसम है। लकदक, तड़क भड़क, जगमग, झमाझम। शादी में खर्च करना ही औकात दर्शाने का माध्यम बन गया है। इस सब की वजह से शादी में दहेज़ की मांग बढ़ गयी है। अब बेरोजगारों की बोली भी पांच लाख लगती है।

बेटी का बाप, मजबूरन अपनी औकात से अधिक दहेज़ देते है। परिणाम स्वरूप मुफ़्त के पैसे की बर्बादी होना लाजिम है। दहेज़ के पैसे को अनाप शनाप खर्च कर दिया जाता। अब छोटी गाड़ियों की गिनती की जाती है और उसी में मोटी रकम लूटा दी जाती है। इसके बाद, बैंड, आर्केस्ट्रा, बार डांसर, टेंट, शामियाना आदि- इत्यादि।

हम दहेज़ लेकर जो अपनी शान दिखाते है उनकी सराहना करते है जबकि वो निंदा के पात्र है। हमें आलोचना करनी चाहिए। दहेज़ के पैसे से झूठी शान दिखाना कैसी सम्पन्नता है...?

11 दिसंबर 2015

देश सम्मान वापसी और बिहार में वोट वापसी का यूटर्न अभियान

देश सम्मान वापसी और बिहार में वोट वापसी का यूटर्न अभियान
अरुण साथी( व्यंग्य)
जमाना सोशल मीडिया का है। यहाँ लंपट, लफाड़, लफुए ऐसे मटरगस्ती करते है जैसे वे अपने भैया के ससुराल में हों और बाकि सब उनके भैया जी की साली या फिर अपने सबसे लंपट फ्रेंड की बारात में आये हों और उनके पास लंपटाई का राष्ट्रीय लायसेंस मिला हुआ हो। यूँ तो ऊपर ऊपर यही लगता है की सब कुछ अपने आप हो रहा है पर सच यह नहीं है। लंपट आर्मी को संचालित करने का रिमोट किसी न किसी के हाथ में है। इन लंपट आर्मी के हाथ में पाँच इंच का टैंक थमा दिया गया है जो उँगलियों के इशारे पे संचालित है और तो और पलक झपकने से पहले ही दुश्मन को धरासायी कर दिया जाता है। यह दीगर बात है कि यह रिमोट वामपंथी, दक्षिणपंथी, समाजवादी, पूंजीवादी नेता, अभिनेता, साहित्यकार किसी के भी हाथ में हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे कठपुतली उँगलियों के इशारे पे नाचती है पर वह भी समझती वही नाच रही है। जय जय जय हो।

लंपट आर्मी का शिकार कोई भी, कहीं भी और कभी भी हो सकता है। लंपट आर्मी में सबसे बड़ी जो खाशियत है वह यह कि इनमे प्रचुरता से सियार का गुण पाया जाता है। बल्कि उससे प्रभावी रूप से असरकारक। चौपाये सियार तो शाम ढलने पे हुआँ हुआँ करते है पर लंपट आर्मी चौबीस गुणा सात हुआँ हुआँ करते रहते है। लंपट आर्मी में एक और गुण चौपाये सियारों से बिशिष्ट होती है, यानि रंगे सियार के साथ भी हुआँ-हुआँ करना। खास बात यह कि ये अतिसाहिष्णु होते है। वानगी देखिये। कुछ माह पूर्व ये काला धन, सैनिकों के शहीद होने, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पे हुआँ- हुआँ ऐसे किये की बाकियों को अपनी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण पत्र इनसे लिखबना पड़ा। कुछ को पाकिस्तान भी जाना पड़ा!

समय बदला, राजा भी बदल गए पर ब्यवस्था वहीँ की वहीँ रही। अचानक एक दिन सब जुमला कह दिया गया। रंगा सियार का रंग उतर गया। पर लंपट आर्मी अपनी भक्ति परम्परा को आंच नहीं आने दी। सहिष्णुता और अटूट आस्था के दम पे वो आज भी हुआँ-हुआँ कर रहे है।

इनका गुण वैम्पायर की तरह वायरल होता है। वैसे तो सबकुछ ठीक ही रहता है तबतक; जबतक आप हाँ में हाँ मिलाते रहें। कहीं न किया नहीं की तुरंत वहीँ के वहीँ किसी की भी माँ-बहन कर देंगे, आखिर लंपट आर्मी जो है।

देहात में एक कहावत बड़े बुजुर्ग कहते है "कौआ कान ले ले जाय, कुछ खबरे नै" । इसे समझाते हुए बुर्जुग कहते कि यदि कोई कहे की कौआ कान लेके भाग गया तो समझदार आदमी पहने अपना कान देखता है और बेवकूफ आदमी कौआ के पीछे दौड़ने लगता है। अब देखिये सोशल मीडिया पे कैसे सब कौआ के पीछे दौड़ लगा रहे है। मशलन दिल्ली के कार का मामला लीजिये। लोग अपनी कान देखे बिना केजरी पे पीछे लग गए। हालाँकि जब सर्वश्रेष्ठ संस्था के प्रमुख ने बताया कि हमें अपनी कान देखनी चाहिए, तब जाके लोग अपनी कान देख के लजा गए। वह वहीँ था! हाँ लंपट आर्मी नहीं लजाई।

अब हुआँ हुआँ कर सम्मान लौटने वाले भी लजाये है या नहीं, कह नहीं सकता। वैसे सर्वश्रेष्ठ संस्था के प्रमुख ने कह दिया की देश में असहिष्णुता कहीं नहीं है, बड़े बड़े देशों में छोटी छोटी गलतियां होती रहती है। पर लगता है लजाये नहीं हैं वरना फिर सम्मान वापसी अभियान चलता और हुआँ-हुआँ कर जिन्होंने सम्मान लौटाया वे वामांगी, वैचारिक, अतिविशिष्ट लोग लौटाए गए सम्मान को फिर फिर से वापस मांग लेते, साथ में कुछ नकद-नारायण भी दिलवा दिया जाता, है की नै...

वैसे बिहार में नयी सरकार आते ही दस साल तक शितनींद्र में रहे "हलुकबन्दर" सब उत्पात मचने लगे है। जहाँ तहाँ छीना-झपटी, मार-कुटाई हो रही है। उठाई अभियान भी चलने लगा। अब इससे परेशान बेचारे वोटर वोट वापसी का अधिकार मांग रहे है। भैया जान बचेगी तब जात-पात कर लेंगे, अभी वोट तो वापस कर दो।।।।।

01 दिसंबर 2015

मदरसों में यौन शोषण पर चुप्पी क्यों....?

केरल के मदरसों में यौन शोषण से जुड़ी अपनी बचपन की यादों को फेसबुक पर साक्षा करने वाली महिला पत्रकार वीपी राजीना को जान से मारने की धमकी दी गई है। असहिष्णुता का हंगामा करने वालों ने ही राजीना का फेसबुक एकाउंट को फेसबुक से शिकायत कर बंद करा दिया, क्या यह असहिष्णुता है? असहिष्णुता का आरोप लगाकर हंगामा करने वालों ने कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया है...! क्या मुस्लिम कट्टपंथियों का असहिष्णुता की छूट है..?
सेकूलर जैसा सौहार्द और भाई चारे का प्रतीक एक शब्द को साहित्यकारों, कलाकारों के द्वारा आज कोठे पर बैठा दिया गया है। देश की नाकारात्मक छवि बनाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। बहुत हद तक इसमें सफलता भी मिल रही है। इसकी वागनी सांसद मो0 सलीम का गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयान को संसद में उठाना है जिसमें आउट लुक पत्रिका ने यह प्रकाशित किया कि राजनाथ सिंह ने कहा कि आठ सौ साल बाद देश में हिन्दू शासक लौटा है। बाद में पत्रिका ने माफी मांगी.. पर सांसद ने नहीं...कितनी सहिष्णुता है..? राजीना का साथ अमीर खान, शाहरूख खान या महान साहित्यकार क्यों नहीं देते...? 
उधर हरियाणा के एसपी संगीता कालीया को महज इसलिए तबादला कर दिया गया क्योंकि उसने एक बीजेपी के मंत्री अनील बीज को प्रत्युत्तर में जबाब दिया, सच का आइना दिखाया...प्रताडि़त करने का प्रतिवाद किया..। यह वही बीजेपी है और वही हरियाणा है जहां एक आइएएस अधिकारी अशोक खेमका को रावार्ड बाडा्र प्रकरण पर कांग्रेस सरकार के द्वारा प्रताडि़त किए जाने पर हंगामा किया गया था...! बहुत कुछ साफ है, आइने की तरह, बस हमने अपनी आंखों पर चश्मा पहन लिया है, जो किसी के समर्थक और विरोधी होने का है..
अल्ला जाने क्या होगा आगे..

12 नवंबर 2015

कुम्हार और ईश्वर

कुम्हार और ईश्वर 
**
मिट्टी गूंध
चाक पे चढ़ाया
उसे धुमाया
सधे हाथ से
अंदर से सहारा दे
बाहर से दबाया
कुम्हार ने दीया बनाया।।

फिर उसे 
आग में पकाया
और बाजार ले आया।।

वही दीया
कोई मज़ार पे
कोई मंदिर में
कोई चमार घर
कोई बाभन घर जला..
***
हे कुम्हार
कहीं तुम ईश्वर तो नहीं...

02 अक्टूबर 2015

गांधी को किसने मारा ?

गांधी को किसने मारा ?
***
गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद
जिन्ना की जगह
पंडित जी हुए प्यारा ।
सोंचों गांधी को किसने मारा ?

***
सेकुलरिज्म के झंडाबदारों
बताओ
देश का प्रधान
मोमिन क्यूँ नहीं हुआ
और
डॉ कलाम जैसा भी क्यूँ हारा ?
सोंचों गांधी को किसने मारा ?
***
नौआखाली से लेकर
गोधरा,
गुजरात,
मुजफरनगर,
पानेसर,
दाभोलकर,
और कुलबर्गी तक
गोडसे हर बार हुंकारा ।
सोंचों गांधी को किसने मारा ?
***
रघुपति राघव
मुल्लों को लगा न प्यारा,
ईश्वर अल्ला
पंडित को हुआ न गंवारा
सोंचों गांधी को किसने मारा ?
***

न सत्य
न अहिंसा
न ही गांधीवादी
विचारधारा है ।
सच तो ये है कि
गांधी को हमने ही मारा है ।
गांधी को हमने ही मारा है ।।
------02/10/2015----
@अरुण साथी/बरबीघा/बिहार 9234449169

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