22 जुलाई 2015

राजनीति में सफल होने के नुस्खे ..

(अरुण साथी)
(धोषणा:-यह एक नुस्खे का विज्ञापन है, इसका किसी राजनितिक दल अथवा व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है ।)

विज्ञापन:-

पहले मैं बहुत उदास और बुझा बुझा रहता था । किसी काम में मन नहीं लगता था । अपनी उदासी और कमजोरी की वजह से मैंने घर परिवार त्याग दिया । फिर किसी ने मुझे एक राजनीति नामक नुस्खा दिया । उसका सेवन करते ही मेरे जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन आये । इस नुस्खे ने मेरा सम्पूर्ण जीवन बदल कर रख दिया ।

इस नुस्खे का सेवन करते ही मैं सिंहगर्जना करने लगा और मेरा नाम शेर सिंह रख दिया गया । सबसे पहले मैंने अच्छे दिन लाने का सपना सबको दिखाया और लोग इसपे भरोसा करने लगे । फिर मैंने पड़ोसियों को चेतावनी दी की वह मेरे घर की तरफ आँख भी उठा कर देखा तो आँख फोड़ दूंगा । फिर मैं धर्म का सार्थक उपयोग करना सिख लिया और इसका मुझे बहुत लाभ मिला ।

फिर मैंने काला धन नामक एक घुन जो अंदर ही अंदर अपने घर को खोखला कर रहा था, उसे ख़त्म करने का एलान किया और इसके लिए मैंने हजारों करोड़ काला घन विज्ञापन पे खर्च किया । इसके आश्चर्यजनक फायदे हुए और मैं रातों रात भगवान् बन गया । भक्त मेरी चरण बंदना करने लगे ।

फिर मुझे सिंघासन मिली और मैं सर्वशक्तिमान हो गया । इसी सिंघासन पे विराजनेवाले अपने प्रतिद्वंदी का ब्रह्म नुस्खा "मौन" को मैंने धारण कर लिया । अब मैं भ्रष्टाचार, पड़ोसियों का दुर्व्यवहार, कालाधन जैसे परम्परागत सिंघासनी दुर्गुणों के साथ मौन व्रत धारण कर शांतिपूर्वक पूर्वक विदेश परिभ्रमण करता रहता हूँ और विरोधियों के सीने पे साँप लोटते रहते है ।

25 मई 2015

मनमोहनी ...


गांवों की कुछ स्त्रियों में स्व-सौंदर्यबोध अत्यधिक होती है इसलिए वे खुद को बहुत मेंटेन रखती है... और बेहद खूबसूरत और मनमोहक होती है। ऐसी ही एक

मनमोहनी से पिछले दिनों आंखें चार हो गई। गेहूंवां रंग, सितुआ नाक, लंबा धरिंग..और अल्लू के फांक जैसी आंखें.। कमर से नीचे तक नगीन सा लहराते बाल। मजमूमा इत्र और नारित्व की मिलीजुली खूश्बू से गहगह गमकता देह किसी को भी मदमस्त कर दे।

उम्र चालीस से जरा भी कम नहीं, पर देख को कोई तीस से ज्यादा नहीं कह सकता.. समूचा देह कसा हुआ। सूती की साड़ी और मैंचिंग ब्लाउज के बीच उसका यौवन किसी काचूर छोड़ती नागीन सरीखी लग रही थी..बाहर आने को आतुर...साक्षत यक्षिणी की तस्वीर...।

मैं ठहरकर उसे देखने लगा, जी भरकर...। अचानक मृगनयनी की नजर उठी और मुझपे ठहर गई...मैं सकपका गया और शर्मा कर नजरें झुका ली...फिर नजर उठाया तो उसके चेहरे पे अजीब सी एक छलिया मुस्कान तैर रही थी.. जैसे कह रही हो, यह रूप, यह यौवन, यह श्रृंगार तबतक अधूरा है जबतक किसी भंवरे का शिकार न कर ले। आज का शिकार मैं बना था।....उस दिन से लेकर आज तक उसकी छवि आंखों में तैरती रहती है पर वह फिर कहीं नजर नहीं आई...

तब से लेकर आज तक सोंचता रहता हूं कि श्रृंगार ही महिलाओं का श्रृंगार है और गांव में रहकर अपनी सुन्दरा को सजाते-संवारते रहना भी एक कला ही है जो बहुत कम ही महिलाओं को आती है...और ऐसी महिलाऐ हर किसी को लुभाती है..मुझे भी लुभा गई.. कमबख्त...

फोटो - गूगल से साभार 

18 मई 2015

भाड़ी...

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हम मंगैलूं मोछ वाला, मोछ मुंडा काहे अईले रे । मार......चोट्टा, साला...पूरा गाँव हंसैलए रे....। 
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इस भाड़ी को सुन, जाने क्यों मन में गुद्गुद्दी होने लगती है । बिहार में इन दिनों शादी ब्याह का मौसम है और महिलाओं द्वारा अपनी गीतों से भाड़ी के रूप में जम के गाली दी जा रही है । इन भाड़ियों में ग्राम जीवन का माधुर्य और मिठास होती है । 
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कई भाड़ी तो इतने अश्लील होते है कि आप शर्मा जाईयेगा...खुले आम गाली का यह चलन बिहार में तो है , बाकि जगहों का मैं नहीं जानता । गाँव में इस तरह की भाड़ी गाने के लिए खास गितहरी महिलाएं होती है । 
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बहुत दिनों से सोंच रहा था की आखिर इतने अश्लील गीत की यह कैसी परम्परा है ? पर आज जो मन ने तर्क दिया वह यह है की इस तरह खुले आम गाली देने पे भी कोई कुटुंब बुरा नहीं मानते, क्यों? सभी हंस के इसे टाल देते है । 

आम जीवन में भी यदि गाली के प्रति हमलोग इसी तरह का सहज भाव रखें तो जीवन के अमूल क्रांति घटित हो जाये । जीवन प्रेममय हो जाये ।।।। 
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इसी तरह के कुछ सहज गीत
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लाबा न छिटहो दुलरैते भईया, बहिनी तोहरियो जी ।
अंगूठा ना छुअह् छिनारी के पूता, धानी तोहारियो जी ।।
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माई-बाप के चरन दूल्हा, कहियो न छूला जी ;
धानी के चरन छू के, कत्ते नितरैला जी ।।
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04 मई 2015

लव, सेक्स और धोखा ....

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मन वेदना से भरा हुआ, उद्विग्न है । कल एक साथ कई घटनाएं घाटी । जिला मुख्यालय के एक होटल में एक प्रेमी युगल प्रेमालाप का वीडियो बनाया और वह व्हाट्स अप्प पे वायरल हो गया । होटल में छापेमारी कर पुलिस ने संचालक को गिरफ्तार कर लिया । लड़का वार्ड पार्षद का बेटा है....। लड़की स्वेच्छा से अपने अंतरंग संबंधो का वीडियो बनाने में सहभागी बनी । प्रेम जाल में फंस कर । 
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दूसरी घटना बीती रात को बरबीघा में घटी । रात को ग्यारह बजे एक परिचित ने सूचना दी उनके एक किरायेदार नवविवाहिता आग से जल गयी है । भाग कर गया तो दिल दहलाने वाला मंजर । पूरी तरह जली युवती मौत मांग रही थी । उसका पति भाग गया । सभी ने मिलकर उसे अस्पताल पहुँचाया । फिर पटना रेफर किया गया । 
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युवती ने प्रेम विवाह किया था, एक साल पुर्व ही ! पति प्रायवेट जॉब में था और दोनों अकेले रहते थे । एक साल में प्रेम विवाह कि परिणति यह हुई, कैसा प्रेम है ...!
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आचार्य रजनीश (ओशो) ने कहा है की जब प्रेमी, प्रेम में होते है तो उसे अपने प्रेम के केवल और केवल अच्छाईयां नजर आती है । प्रेमी एक दूसरे को अच्छाईयां ही दिखाने का प्रयास करते है और ऐसा कम समय साथ रहने पे होता है । जैसे ही वे नजदीक आते है तो उनकी बुराईयाँ सामने आती है तो उनको धक्का लगता है । इसी कारण प्रेम विवाह ज्यादातर असफल हो जाते है । 
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आज प्रेम, देह की परिधि में सिमट मृतशय्या पे कराह रहा है । कहीं अपने ही प्रेम को सरे बाजार रुस्बा कर दिया गया और जिस देह को पाने की चाह में जाने क्या क्या किया उसे ही बाजारू कर दिया । पुरुषप्रधान समाज में लड़का चाहे जो करे, कलंक लड़की के माथे ही आना है । वहीं एक प्रेम में जिस देह को पाने के लिए परिवार और दुनिया को ठुकरा दिया गया, उसी प्रेम ने उसी देह को आग के हवाले कर दिया... कैसा प्रेम है....।
मुझे तो अब लगता है कि प्रेम अब केवल लव, सेक्स और धोखा ही रह गया है ....जिसमे हर हाल में खोना केवल स्त्री के भाग्य में बदा है...बदनसीब...

@अरुण साथी/बरबीघा/बिहार/04/05/2015

27 अप्रैल 2015

गाँव के लोग ...

भूकंप ने सबको डरा तो दिया है पर गाँव के लोग बहुत कम भयभीत है । गेहूँ मैंजने का समय है और खलिहानों में ट्रेक्टर के साथ चलनेवाला हथिया थ्रेसर गडगड गरज रहा है । गाँव में भूसे का गर्दा उड़ रहा है । अपने बेटे को कोसते हुए शिबालक का कह रहे है " नलैकबा दिन-रात टंडेली करते रहो हो । हथिया थ्रेसर में बिना तीन-चार आदमी के मैंजनी होबो है । जीन्स औ टीसट झाड़ के गुटका चिबैते रहो है यहाँ हमरा गाड़-गोहलत होल है ।" भूकंप के बारे में पूछने पे कहते है " हमरा कहाँ पता लगलो, कट्टु ढो रहलियो हल, यहाँ किसान के जिनगी में तो रोज भूकंपे आबो है, एक बीघा में आठ मन गहूँम होलो हें औ ओकरा उपजाबे में ओकरा से जादे खर्चा हो । की करियो छो मासी पैदा है अबरी नै तो अगला बार होतई । 
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गाँव में अफवाह का भी कोई खास असर नहीं दीखता । सब अपने अपने कम के हिसाब से जुटे हुए है । आठ बजते बजते ज्यादातर लोग सो जाते है । नाइकी चाची चिल्ला रही है । "ऐतना पाप धरती पर बढ़ गेलो है बउआ त धरती डोलबे करते नै । कुल पपियहा सब लूट पाट के जग हवन करो है त नाग बाबा पुछिया हिला दे हखिन औ भूकंप आ जा है ।"
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उधर फुफ्फा सुराज सिंह गरम हें । जहाँ दुनिया बेटी के जन्म पे शोक मनाती है और गर्भ में ही मार देती है वहीँ उनकी गाय ने चौथी बार बाछा (बेटा) को जन्म दिया है । बहुत चिंतित है । " बोलहिं तो सोंचलिय की बाछी बिया जेतै त जरोह हो जात पर बाछे बिया रहल हें ।" 
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मैं उसी बाछा के साथ सेल्फ़ी खीच लिया । आज बिसतौरी (जन्म के बीस दिन बाद गाय का दूध पीने की परम्परा) पूरा हो गया है और इसी की माँ का दूध आज से पीने का सौभाग्य मिलेगा । देशी गाय का दूध अहोभाग्य होता है । ओशो कह गए है की मौत तो निर्धारित समय पे ही आनी है फिर मौत से पहने क्या रोज रोज मारना.? फिर ही भूकंप में मरे लोगों की वजह से मन गम में डूब जाता है । उनको एक श्रद्धांजली..

24 अप्रैल 2015

दिनकर की यादों को बिहार सरकार ने जमींदोज किया।(पुण्य तिथि पर राष्ट्रकवि का नमन।)

दिनकर की यादों को बिहार सरकार ने जमींदोज किया।
(पुण्य तिथि पर राष्ट्रकवि का नमन।)
अरूण साथी/शेखपुरा/बिहार
बिहार सरकार साहित्यकारों के प्रति किस प्रकार का भाव रखती है इसकी वानगी है दिनकर जी की स्मृति से जुड़ा शेखपुरा जिला मुख्यालय का ध्वस्त कचहरी भवन। इस भवन में दिनकर जी रजिस्ट्रार की नौकरी करते थे और बिहार सरकार इसे संभालने के बजाय इसे ध्वस्त कर अब यहां एक भव्य मॉल का निर्माण कराएगी। इस भवन को शेखपुरा नगर परिषद के द्वारा ध्वस्त किया गया है। इस दुखद घटना पर दिनकर जी की ही रचना के साथ पुण्य तिथि पर उनको नमन करता हूं......


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हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?

यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।

चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।

है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।

ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।

जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है; 
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वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।

तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।

पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।

जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।

कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।

हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?

हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !

जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,

रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।

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कसाई !