वह छत के ऊपर से मूतता था, आने-जाने वालों पर छींटे पड़ते थे।
एक दिन, जब उसी राह से पूजा करने जा रही थीं महिलाएँ,
वह औंधे मुँह गिरा हुआ था, अपने ही मूत पर...
पटना के प्रख्यात कवि अरुण कमल जी की यह कविता शायद 10–15 साल पहले पढ़ी। एक साथी से पुस्तक मांगी थी। कई कविताएं थी जो चिंतित करती थी। फिर उस पुस्तक का फोटोस्टेट करके रख लिया। आज खोज रहा। पुस्तक नहीं मिल रही। खैर, यह एक कवि का शाश्वत चिंतन है...आज हम सोशल मीडिया पर छत के ऊपर खड़े होकर छीटें उड़ाते हैं... ऐसे कई लोग देखते है...और फिर औंधे मूँह उसको गिरा हुआ भी देखते है...
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