03 अगस्त 2013

मोदीगिरी-द डिजास्टर मनेजमेंट बनाम अंधों में काना राजा

आउल बाबा परेशान है! ई कौन सा जादू हो गया कि कल तक आउल आउल चिघारने वाले आज नमो नमो मंत्र का जाप करने लगे! कितना सबकुछ किया, कभी दलित के घर जाकर भोजन किया तो भी भीड़ में जाकर लोगों से बतियाया फिर भी...?
आउल बाबा परेशान, अपने कई विदेश के मित्रों से सलाह ली पर किसी ने उचित सलाह नहीं दी। एक दिन उसे एक मित्र ने सलाह दी। मोदीगिरी-द डिजास्टर मनेजमेंट सीखने की। आलउ बाबा ने दिल्ली से लेकर इटली तक ढुंढ़वा लिया कहीं इसका फंडा नहीं मिला। कैसे एकाएक पानी पी पी कर गरियाने वाला मीडिया आज नमो नमो कर रहा है?
नाराज बाबा ने मम्मी से शिकायत की, मोदीगिरी सीखना है। मम्मी जी ने भी अपने सभी पूराने नेताओं को बुलबा लिया। बताओ, मोदीगिरी....।
आखिर क्या हुआ कि सब नमो नमो करने लग गया। किसी ने कहा कि सब कॉपोरेटों का कमाल है, उसी की फंडिग से सारा खेला हो रहा है। किसी ने इसे निक्कर का कमाल बता दिया। वहीं अपने डुग्ग डुग्गी राजा ने सबसे एक कदम आगे बढ़कर इसे अमेरिका की साजिश करार दे दिया। इतना सुनते ही मैडम जी उखड़ गई। ‘‘आपसब को कुछ पता तो होता नहीं बस अमेरिका अमेरिका बोल देते है, अरे उसकी सारी योजनाओं को हम लागू कर ही रहे है फिर वह नमो के साथ क्यूं जाएगा?’’ प्रेट्रोल-डीजल लोग कम खरीदें इसके लिए उसी के ईशारे पर दाम बढ़ाए। हथियार भी उसी से खरीदा?’’ फिर।
धंटो मंथन के बाद किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। आउल बाबा परेशान! तभी मैडम का मोबाइल बज उठा। स्क्रीन पर नमो का नाम उभरा। सब अचंभित। मैडम जी वहां से उठ कर किनारे में चली गई, बतियाने। ‘‘हलौ, देखिए आप डुग्ग डुग्गी जैसों को थोड़ा समेटिये, बड़ी मुश्किल से इस मंहगाई और भ्रष्टाचार को किनारे लगाया है। देखे न मेरा फंडा। और हां ई बाटला हाउस पर गेम उलटा पर गया जी। फिर भी अभी ईशरत जहां का मामला है।
थैंक्यू, थैंक्यू, मैडम जी लगातार बोली जा रही थी और अन्त में बोली- ‘‘थैंक्यू नमो जी, आप नहीं होते मंहगाई और भ्रष्टाचार पर चुनाव लड़ने में दोनों को घाटा हो जाता है। अब देखिए सब का पत्ता साफ कर दिया। बाकई आपने बेस्ट पॉलिसी खोज निकाला। थैंक्यू।।’’
उधर से जब मैडम जी आई तो सबकी आंखों में एक सवाल था, जबाब में मैडम ने सिर्फ इतना कहा कि यह हाई लेबल पौलटिक्स है तुम नहीं समझोगे। तुम लोग थोड़ा सावधानी से नमो पर बार करो और हां ध्यान रहे हम केवल धर्म की राजनीति करेगें इधर उधर कोई नहीं भटेका।
मैं क्या करता? सब कुछ चुप चाप सुनता रहता हूं। कौन यह कह कर माथा दरद मोल ले कि नमो की तरह बनने के लिए पहले आम होना पड़ेगा, बीआईपी नहीं? जमीन पर जाकर काम करना होगा आउल बाबा, नौटंकी नहीं?
और अन्त में मेरे मुंह से पता नहीं कैसे निकल ही गया ‘‘ अजी जानते नहीं है आप लोग कि कैसे अपने आउल बाबा देश की गंभीर समस्याओं पर भाग खड़े होते है और जब मंहगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी की समस्या रहेगी तो इसी तरह से अंधों में काना राजा बनता ही रहेगा.....’’

18 जुलाई 2013

‘‘खिचड़िया माल’’ के नाम से मिलता है मिड डे का नकली और सस्ता सामान।

‘‘खिचड़िया माल दिजिए’’ किराना दुकान में यदि ऐसे वाक्य सुनने को मिले तो कोई भी समझ जाता है कि यह मिड डे मिल का सामान मांग रहा है। मिड डे मिल मंे गुरूजी की ज्यादा से ज्यादा बचाने की ललक में वह सब कुछ हो रहा है जिसके परिणामतः सारण में बीस बच्चों की जान चली गई।
किराने की दुकान में मिलने वाला खिचड़िया माल में रंग मिली हुई हल्दी तथा मिर्च की गुंडी मिलती है तो धनिया के गुंडी में घोड़े की लीद मिली होने की बात जगजाहीर है। वहीं मसूर की दाल की जगह गुरूजी खेंसारी एवं मटर की दाल का ही प्रयोग करते है। सोयाबीन भी पिल्लू युक्त और सड़ा गला रहता है जिसमें आटा की मिलावट रहती है तो सब्जी मंडी में सड़ी गली सब्जी को दुकानदार फेंकने की जगह मास्टर साहब के लिए रख देते है और ये सारा सामान पच्चास से सत्तर प्रतिशत तक सस्ता मिलता है।
मिड डे मिल में लूट खसोट और लापरवाही की पराकाष्ठा है। आयोडाइज्ड नमक को बच्चों के बुद्धी बढ़ाने वाला माना जाता है पर गुरूजी साधारण नमक ही खरीदते है। वहीं गरम मशाला, गोलकी-जीरा का महज वाउचर ही गुरूजी लेते है इसकी खरीद कभी नहीं होती। यही हाल आलू का भी है। बाजार में सड़ने के कगार पर पहूंचे आलू को मास्टर साहब दुकानों से खोज कर खरीदते है।
मीड डे मिल का गोलमाल यहीं पर खत्म नहीं होती। किसी भी स्कूल में नामांकन से चालिस से पच्चास प्रतिशत से अधिक उपस्थिति नहीं होती पर मिड डे मिल के लिए रजिस्टर पर नब्बे से सौ प्रतिशत उपस्थिति बनाई जाती है। धाल मेल यह कि स्कूलों में चावल स्पलाई करने वाले ठेकेदार प्रति बोरा दस किलो चावल कम देते है वह भी घटिया भी और फाइल में यदि दस बोरा की आपुर्ति स्कूल के लिए है तो स्कूल तक पांच बोरा ही पहूंचता है बाकि का पैसा गुरूजी के पास पहूंच जाता है।
नाम नहीं छापने के शर्त पर एक शिक्षक ने बताया कि प्रति सौ बच्चा 100 से 150 रूपये का ही खर्च गिरता है जिसमें सब्जी से लेकर दाल और मशाला सब शामिल है वहीं वाउर 365 से 500 रू0 का बनता है। एक प्रभारी तो बड़ी दिलेरी से कहते है कि मिड डे मिल की वजह से वे कभी अपने वेतन के बैंक खाते की ओर नहीं देखते।
इस बंदरबांट में प्रति स्कूल से मासिक नजराना भी बंधा हुआ है इस संबंध में दुर्गा प्रसाद धर की माने तो प्रति स्कूल प्रति सौ बच्चा 500 से 800 रू0 मासिक नजराना बंधा है और इसमें नीचे से उपर तक सभी पदाधिकारी पैसा खाते है।
वहीं रालोसपा के प्रदेश उपाध्यक्ष शिवकुमार ने कहा कि इस मिड डे मिल योजना मास्टर और पदाधिकारियों के लूटने के लिए चालाई जा रही है और सारण की घटना पर सीएम को माफी मांगनी चाहिए।
बहरहाल इस पूरी व्यवस्था को बिना बदले मिड डे मिल में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती और पूरी व्यवस्था में बदलाव की इच्छा शक्ती शायद ही हममें है।

आंकड़े
शुद्ध सामान की कीमत/किलो खिचड़िया माल की कीमत/किलो
मसूर दाल 56-60 खेंसारी दाल 26-30
हल्दी गुंडी 110-120              रंग युक्त 55-65
मिर्च गुंडी 110-120            रंग युक्त 55-65
धनिया गुंडी 80-90 मिलावटी 30-40
सोयाबीन बरी 65-75 मिलावटी 45-50
आयोडीन युक्त नमक 16 साधारण नमक 05
करूआ तेल 95-100 मिलावटी 70-75
हरा सब्जी 15-20        सड़ी गली 05-08


17 जुलाई 2013

बाबा रामदेव के चेले की काली करतूत

बाबा रामदेव के चेले की काली करतूत अभी अभी सामने आई है। बिहार के शेखपुरा जिले के बरबीघा बाजार में किराना की दुकान चलाने वाले एक चेले ने लोगों से नौकरी लगाने के नाम पर लाखों की ठगी की है। खबर है कि ठगी के शिकार हुए लोग रोज उनके दुकान और घर पर जाकर हंगामा कर रहे है। वहीं उनके द्वारा एनआईओएस में परीक्षा पास कराने के नाम पर भी दस दस हजार की बसूली की गई है।
समारोहों से लेकर चाय दुकान तक साहब भ्रष्टाचार को लेकर इतना लंबा फेंकते है कि एकबारगी लगता है गांधी जी भूत इनमें ही समा गया हो....जनाब ने दिल्ली तक जाकर बाबा जी के आंदोलन में भी हिस्सा लिया है।
अब इनके सहारे बाबा जी देश से भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते है तो परिणाम क्या होगा समझा जा सकता है।

11 जुलाई 2013

मां बाप पर बोझ है बेटी! राजस्थान से आकर नवालिग से शादी रचा रहा युवक गिरफ्तार।



‘‘बियाह नै करे ले चाहो हियै सर? आज भोरे पता लगलै की बियाह होतै। केकरा से बियाह हो रहलै हैं हमरा नै पता है?’’ यह कहना है रिंपल की। आजादी के इतने सालों बाद और मानव विकास तथा नारी सशक्तीकरण के दावों के बीच रिंपल एक यथार्थ है हमारे समाज और उसके पिछड़ेपन की।
रिंपल शेखोपुरसराय थाना के जीयनबीघा गांव की रहने वाली है और तीन साल पहले ही उसने पांचवी तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया। रिंपल की उम्र अभी मुश्किल से तेरह साल होगी और आज रिंपल की शादी होने वाली थी वह भी राजस्थान के चालिस वर्षिय युवक के साथ पर एसपी मीनू कुमारी की पहल पर पुलिस ने शादी से पहले ही कुसेढ़ी के पंचवदन स्थान से युवक को हिरासत में ले लिया।
यह त्रासदी नहीं तो और क्या है कि रिंपल के माता पिता इस शादी में शरीक नहीं हो रहे थे और बभनबीघा निवासी उसके जीजा दिलीप राम पीला धोती पहन और हाथ-पैर रंग कर कन्यादान करने के लिए तैयार था।
यह समाज का पिछड़ापन और जगरूकता की कमी ही है कि लड़की के जीजा कहते है कि गरीब की बेटी है सर किसी तरह निवह जाना है। आलम यह है कि लड़का कहां का रहने वाला है और किस जाती का है यह भी लड़की के परिजनों को पता नहीं है पर लड़की का निवाह करना था सो शादी कर रहे थे।
पुलिस की हिरासत में लिए गए युवक ने अपना नाम महिपाल सिंह यादव बताया वहीं अपना पता राजस्थान के अलवर जिले के कोर्ट कश्मीरी बता रहा है। युवक से बरबीघा थाना के प्रभारी थानाध्यक्ष सत्येन्द्र शर्मा एवं इंस्पेक्टर अरूण शुक्ला पूछ ताछ कर रहे है जिसमें इस बिन्दू पर भी नजर रखा जा रहा है कि कहीं शादी के बहाने युवक मानव तस्करी का करोबार तो नहीं करता।
वहीं इस संबंध में थानाध्यक्ष ने बताया कि एसपी के आदेश पर लड़की का मेडिकल जांच कराया जाएगा और इसके बाद जो तथ्य सामने आएगें उसी के हिसाब से कार्यवाई की जाएगी। इस सारे घटनाक्रम को देख कर सोंच रहा हूं कि क्या मां बाप पर बेटी बोझ है! और यदि है तो इसके लिए हमहीं जिम्मेवार भी है...

16 जून 2013

एक ही झटके में खलनायक हो गए नीतीश कुमार......

अरूण साथी
अभी कुछ ही महीने पहले तक नीतीश कुमार वैसे नायक की तरह उभरे थे जिन्होंने जंगलराज को सुशासन में बदल दिया था। देश ही नहीं दुनिया भर में इसकी चर्चा हो रही थी और बिहार का आम आवाम चैन से रहने लगा था। विपक्ष के पास कोई मुद्दा ही नहीं था सरकार को घेरने का। पर एक ही झटके में छद्म धर्मनिरपेक्षिता का ऐसा भूत नीतीश कुमार के सर पर सवार हुआ कि वे आवाम की नजरों में खलनायक हो गए।
राजनीति में अतिमहत्वाकांझी होने में कोई बुराई नहीं है क्यों राजनीति करने वालों को हमेशा से यही सिखाई जाती है पर नीतीश कुमार को बिहार के जनमानस को भांप कर कदम उठाना चाहिए था।
इससे पुर्व भी बिहार में रामविलास पासवान और लालू प्रसाद ने छद्म धर्मनिरपेक्षिता का स्वांग रचा था। रामविलास ने कुछ माह बचे होने पर केन्द्रिय मंत्रीमंडल से गोधरा कांड को लेकर इस्तीफा दे दिया और लालू प्रसाद ने आडवानी का रथ रोका और उन्हें गिरफ्तार किया। इतना ही नहीं लालू प्रसाद ने पोथी-पतरा जलाने का काम किया और पंडितों को अपमानित किया। सबक जनता ने सिखाया। आज दोनों राजनीति के हासिये पर चले गए। 
वही लालू प्रसाद आज पूजा-पाठ से लेकर मंदिरों में माथा टेकते फिर रहे है! मेरा कहने का मतलब यह कि धर्मनिरपेक्षिता का मतलब मुस्लमानों के तुष्टीकरण के लिए स्वांग करना नहीं होता? धर्मनिरपेक्षिता का मतलब सभी धर्मों के प्रति निरपेक्षता से होता है न कि मुस्लिम धर्म के प्रति सापेक्षिता से।
आज पूरे देश की राजनीति मुस्लमानों के तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के इर्द गिर्द घूम रहा है। अखिलेश सरकार पुलिस के द्वारा जान पर खेल कर पकड़े गए कई आतंकवादियों से मुकदमा उठाने की राजनीति करते है तो कांग्रेस जम्मू कश्मीर में मारे गए आतंकियों के परिजनों को मुआवजा देने की ऐलान करती है। मतलब देश से बड़ा वोट बैंक हो गया....
इन सबसे एक कदम आगे बढ़ कर नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी का विरोध कर दिया। वह भी तब जब दंगे कराने के आरोपी मोदी को केन्द्र की एसआईटी ने बरी कर दिया और कोर्ट ने अभी तक दोषी नहीं माना है। और कानूनी पचड़े अलग भी जब गुजरात में दंगा हुआ तो नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री बने रहे। मोदी के साथ इनके अच्छे संबंध जगजाहीर है। फिर एकाएक प्रधानमंत्री बनने की अतिमहत्वाकांक्षा ने सब गुंड़ गोबर कर दिया और अंजाम के तौर पर विकास की राह पर चल पड़े बिहार की गाड़ी को  ब्रेक लग गया। सत्तरह साल पुराना गठबंधन टूट गया। कल तक जनता की मार से पस्त पड़े लालू प्रसाद दहाड़ने लगे। सरकार के विरोधी जश्न मनाने लगे है और यह सब वोट बैंक की राजनीति और मुस्लमानों के तुष्टीकरण के लिए किया गया जो की दुखद है।
गुजरात में जो हुआ वह निश्चित ही दुर्भाग्यपुर्ण था पर इस पर जो राजनीति हो रही है वह भी कम दुर्भाग्यपुर्ण नहीं। दंगे में चाहे जो भी मरे वह हिन्दु हो या मुस्लमान पहले इंसान है। गोधरा में रेलयात्रियों के जलाने पर खामोशी और गुजरात के दंगों पर हाय तौबा....बहुत सालती है। और फिर नरेन्द्र मोदी ही अकेल खलनायक कैसे? पिछले कुछ माह पुर्व युपी में लगातार दंगे हुए है जिसे मीडिया ने भी दबा कर रखा, वह क्या था? और अभी हाल में ही आसाम में हुए दंगे पर खामोशी क्यों? क्या कांग्रेसनित सरकार को दंगा कराने का लाइसेंस है? बात यह कि मुस्लमानों के तुष्टीकरण के नाम पर दोगली राजनीति से देश का भला नहीं होगा। यदि गुजरात में मुस्लमान आज नरेन्द्र मोदी को वोट दे रहे है तो जरा उनसे भी तो कोई पूछे?
इतने सालों के बाद गुजरात दंगे का परत दर परत खुलता भी गया है। जाकिया जाफरी, सितलबाड़ सहित कई अन्य इस राजनीति खेल में नंगे हुए है। 
आज देश की जनता कांग्रेसनित सरकार के त्रास से त्राण चाहती है और मोदी एक चेहरा के तौर पर उभरे जहां एक उम्मीद दिखी और बस इसलिए देश नमो नमो करने लगा और नीतीश कुमार सौतनिया डाह की तरह जल-भुंज कर ओलहन-परतर देकर कलह शुरू कर दिया। देहाती कहावत भी है घर फूटे गंवार लूट, तब लूटने वाला जश्न मना रहा है और लूटाने वाले को इसका एहसास नहीं...

09 जून 2013

कहीं कौमार्य परीक्षण तो कहीं सेक्स करने पर तीरअंदाज को निकाला, शर्म करो सरकार।

अरूण साथी
लगता ही नहीं कि हम आधुनिक युग में रह रहे है और उसी आदिम युग की रूढ़ीवाद हम पर आज भी हावी है। यदि ऐसा नहीं होता तो एमपी में 350 लड़कियों की शादी से पहले कौमार्य और गर्भवती होने की जांच नहीं होती और पूणे में विश्व तीरअंदाजी टीम की एक महिला और एक पुरूष तीरअंदाज कैंप में सेक्स करते हुए पकड़े जाने पर निकाल नहीं दिए जाते!
दोनों ही घटनाऐं विचलित करती है। पहली घटना एमपी सरकार ने वोट की राजनीति के तहत कन्यादान योजना चलाई है और इसके तहत सरकार अपने खर्चो पर शादी करवाती है और इसी शादी समारोह में भाग लेने वाली कन्याओं का कौमार्य और गर्भवती होने का परीक्षण किया गया। कितनी शर्म की बात है। जिन कन्याओं का सर्वाजनिक तौर पर यह कह दिया जाए की उसका कौमार्य भंग हो चुका है या वह शादी से पहले ही गर्भवती है उसके लिए जिन्दगी मौत के समान हो जाएगी। और खास बात यह कि इन लड़कियों में 90 आदिवासी लड़कियां है।
आज जब हम जानते है कि कौमार्य को तय करने वाली झिल्ली कड़ी मेहनत करने अथवा खेलने कूदने से फट जाती है तो फिर इस परीक्षण का क्या औचित्य? क्या यह उस अधिकारी की धृणित मानसिकता का परिचायक नहीं जिसने इस तरह का कार्य किया? 
अब इस तरह की धृणित कार्य के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माफी मांगी है और इसके जांच की जिम्मेवारी उसी जिले के अधिकारी को दिया गया है। साफ है कि इतना धृणित कार्य करने वाले अधिकारी को बचाने के लिए वहीं लीपापोती का खेल शुरू हो गया। 
वहीं दूसरी घटना झारखण्ड के पवन जाल्को एवं गंुजन कुमारी तीरअंदाज के साथ घटी। दोनों पूणा के कैंप में विश्व कप की तैयारी का प्रशिक्षण ले रहे थे। दोनों की उम्र 21 साल थी। दोनों राजी थे। दोनों ने आपसी सहमति से सेक्स किया। फिर कानून की कौन सी ऐसी धारा है जो यह कहे कि बालिगों को राजी से सेक्स करना अपराध है। पर दोनों को कैंप से निकाल दिया और अब दोनों विश्व चैंपियनशिप में भाग नहीं ले सकेगें।
आदीम युग की कट्टरता छोड़ने के बजाय हम उसे और बढ़ा रहे है। अफसोस की हम तब भी अपने को आधुनिक युग के वासी कहते है?

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