22 अक्टूबर 2024

मैला आंचल आज भी मैला ही है

प्रेम के सारे प्रतीकों में प्रेमी युगल का रूठना, झगड़ना, मानना और मान जाना, साहित्य में सर्वाधिक उल्लेखित है।
 मैला आंचल। फणीश्वर नाथ रेणु। अद्वितीय रचना में भी जब कमला और डागडर साहब के रूठने, मनाने, नोंकझोंक उल्लेख आता है।
हैजा डागडर..! रेनू जैसा शाश्वत साहित्य का मर्मज्ञ दूसरा कोई नहीं होगा। पता नहीं मैला आंचल कितनी बार पढ़ा है। फिर पढ़ रहा।
 गांव की बोली। गांव की भाषा। गांव का चरित्र। गांव का संस्कार। गांव की कुटिलता। गांव की क्रूरता। गांव का प्रेम । गांव का दुख।
 जाने क्या-क्या है। बाकी बातों पर बाद में चर्चा ।आज है डागडर और कमला का नोक झोंक सामने आया तो हठात अपना जीवन सामने आकर खड़ा हो गया। आज तक यही तो जिया है।

खैर, सोचा औरों को भी इसे पढ़ाना चाहिए। गांव, समाज, देश, राजनीति, अध्यात्म सबकुछ बारीक से समझना तो मैला आंचल पढ़ लीजिए... कुछ संवाद संलग्न है...
ओशो भी कह गए हैं। प्रेम में तकरार प्रमाणिक है। जहां तकरार नहीं, समझना प्रेम खत्म । समझौता शुरू। बस..

28 सितंबर 2024

आज बात प्रशांत किशोर की ....

आज बात प्रशांत किशोर की ....

प्रशांत किशोर,  पश्चिम की कंपनियों में राजनीतिक ब्रांडिंग की नौकरी का अनुभव लेकर अपने देश लौटे और अपने देश के राजनीतिक दलों के लिए  मार्केटिंग और ब्रांडिंग करने लगे। 
नरेंद्र मोदी से सफर शुरू कर केजरीवाल, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी आदि, इत्यादि को जीत दिलाने के दावे करते रहे। इन्हीं दावे, प्रति दावे के बीच उनमें भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागी । उनके पास राजनीतिक दलों के प्रमुख का सानिध्य था । पहले चरण में प्रशांत किशोर ने जो राजनीतिक दांव चली, उसमें  औंधे मुंह गिर पड़े। 

वे कांग्रेस, ममता बनर्जी, जदयू सहित अन्य दालों के सहारे पीछे के दरवाजे से प्रवेश की राह चुनी । नेताओं ने हमेशा की तरह अपने से होशियार के लिए प्रवेश मार्ग को बंद ही  रखा।

इसके बाद प्रशांत किशोर अपने राजनीतिक दलों से प्राप्त अनुभव से अपनी प्राइवेट लिमिटेड राजनीतिक दल के गठन की रणनीति बनाई। रणनीति के तहत जन सुराज में राजनीतिक दलों से अलग युवाओं को कार्यकर्ता नहीं बनाकर, उसे नौकरी दी। वेतन पर रखा। 


चूंकि प्रशांत किशोर का राजनीतिक पार्टियों के  मार्केटिंग और ब्रांडिंग का पेशा था, तो इसका प्रयोग उन्होंने शुरू कर दिया। प्रशांत किशोर की कंपनी में सोशल मीडिया के महारथी की फौज है और इसके उपयोग, दुरुपयोग की महारथ भी है। 

बस, इसी के साथ खेल शुरू हुआ। पदयात्रा पर निकले । उनकी पदयात्रा जहां भी गई उनकी कंपनी के वर्कर गए। भीड़ जुटा, माहौल बनाया। यह राजनीति में पूंजीवाद और पश्चमीकरण की प्रकाष्ठा है।

इस खेल में मीडिया को अपना हिस्सा बनाने के लिए बड़े से बड़े मीडिया मर्डोक को व्यापारिक साझेदार बनाया। 

फिर छोटे-छोटे यूट्यूबर, फेसबुक पत्रकार को भी पकड़ा और वीडियो के दर्शक के अनुसार आमदनी देने का समझौता कर लिया। 

अब माहौल बन गया । इसकी ताकत दिखाने में पटना में प्रदर्शन हुआ। परिणाम आया। सेवानिवृत आईएएस, आईपीएस से लेकर ठेकेदार, व्यापारी, पूंजीपति, लंपट, लठैत, सोशल मीडिया के जन नेता, सोशल मीडिया के समाज सेवी, भौकाल बनाने वालों ने लाइन लगा दी। 

 साथ-साथ विभिन्न जिलों में मुख्य राजनीतिक दल से टिकट की तत्काल उम्मीद छोड़ चुके पंचायत स्तर से लेकर प्रखंड, जिला, विधानसभा और लोकसभा स्तर तक के अति महत्वाकांक्षी उनके पीछे दौड़ लगा दी है। 

सभी वर्तमान में जनसुरज के विचारधारा नीति रणनीति की चापलूसी कर रहे हैं। 

अब कई चुनौतियां भी है । पहले तो यह है कि सभी जिले में जो लोग कथित तौर पर जनसुरज से जुड़े हैं। वे अति महत्वाकांक्षी हैं।  टिकट नहीं मिलेगा तो यह क्या करेंगे, यह एक चुनौती है।

 हालांकि समाज के बीच से सच्चे सेवक को उठाकर जीतने का भरोसा प्रशांत किशोर कई संबोधनों में दे चुके हैं परंतु यह एक असंभव कार्य है। 


दूसरी चुनौती प्रशांत किशोर के सामने प्रशासनिक अधिकारी होंगे। अनुभव बताता है की नौकरी करते हुए आम आदमी को कुत्ते बिल्लियों की तरह दुत्कारने वाले राजनीति में भी वही स्वभाव लेकर आते हैं । 

तीसरी चुनौती है बिहार के जातिवाद को तोड़ने की । प्रशांत किशोर एक ब्राह्मण है। चुनाव में इसका प्रयोग होगा । अभी के माहौल में वे करेजा चीर कर दिखा दें, तब भी वोट में जाति एक कड़वा सच है और वह अभी रहेगा ही। 

अब प्रशांत किशोर ने भाजपा की चिंताएं बढ़ा दी है। राजद, स्वाभाविक रूप से मन ही मन प्रफुल्लित है। 

 प्रशांत किशोर के साथ अभी अगड़ी जातियां के मुखर लोग ज्यादा दिख रहे हैं। ये आज भी लिजर्ड सिंड्रोम से बाहर नहीं आ पा रहे। केवल इनको ही लगता है दुनिया को बदल देंगे। 

और कुछ बनिक और कुछ धनिक भी अपने  लालच में सामने आए हैं। 

यादव, मुसलमान जिसके साथ हैं, रहेंगे। अत्यंत पिछड़ी जातियां इधर-उधर आसानी से नहीं होती। दलितों के लिए सवर्ण नेता आज सर्वाधिक घृणा के पात्र है। 

अब बिहार में नीतीश कुमार के स्वास्थ्य कारणों से कमजोर पड़ने के बाद बिहार में नेतृत्व की विकल्पहीनता अपने चरम पर है। उनकी अपनी पार्टी में खटपट सामने आ चुका है।

 भाजपा के पास भी इसकी कमी है। बाद में संगठनों से आयातित विकल्प आएंगे । यह अलग बात है। 

तेजस्वी यादव ने अपनी राजनीति की लॉन्चिंग के बाद एक दो असफलताओं से सीख कर ए टू जेड का नारा दिया।  यह केवल मंचीय नारा रह गया।

 वर्तमान में , आमतौर पर राजनीति करने वाले नेताओं की तरह ही सोशल मीडिया और अपने पिता के पूर्व के कुछ से घृणा और कुछ का तुष्टिकरण की राजनीति की राह पर तेजस्वी यादव चल रहे हैं। अपने शासन काल में धन जोड़ो अभियान ही चलाया। आदमी नहीं जोड़ सके। 

चिराग पासवान! पिता और स्वजातीय के लिए अलाउद्दीन का चिराग भर हैं, बस।

 अभिनेता रहे हैं तो उनका अभिनय पिता के पुण्यतिथि से लेकर सभी राजनीतिक कार्यक्रमों में भी दिखता है। 

तब एक उम्मीद प्रशांत किशोर हैं। विकल्पहीनता का विकल्प। आंधों में काना राजा।

अब विकल्प बनेंगे, कितना सीट लायेंगे, कितना बदलाव करेंगे, सब भविष्य के गर्भ में है । भविष्यवाणी अक्सर झूठी अथवा प्रायोजित होती है।

वर्तमान में केजरीवाल का छलावा प्रशांत किशोर की प्रेत बाधा है। उससे भी बड़ी प्रेत बाधा , नीतीश कुमार का सामाजिक न्याय के नारे के साथ बिहार के विकास के लिए खींच दी गई बहुत बड़ी रेखा है। इस रेखा से बड़ी रेखा खींच सकने का विजन तक अभी किसी अन्य नेता और पार्टियों में दिखाई नहीं पड़ता है। बस।



21 सितंबर 2024

नवादा में महा दलितों के घर जलाने की बेदर्द घटना और दबंगों की जाति

नवादा में महा दलितों के घर जलाने की बेदर्द घटना और दबंगों की जाति 


बिहार पुनर्मूषको भव की राह पकड़ लिया है। शनै शनै सब कुछ घट रहा। सब कुछ डरावना है। इसी में नवादा में तीन दर्जन महा दलितों के घरों को जला दिया गया। पर नवादा की घटना में राजनीति और समाज का दोहरा चरित्र भी स्पष्ट रूप से सामने आया। चर्चा उसी की है। 
आग लगाने की घटना में पहली खबर जो ब्रेक हुई इसमें दबंगों के द्वारा दलितों के घरों को जलाने की खबर थी। पूरे विपक्ष ने इसे पकड़ लिया, राहुल गांधी से लेकर तेजस्वी तक। सब भड़क गए। आम तौर पर दबंग का मतलब सवर्ण जाति मान लिया जाता है। पर कई घटनाओं की तरह, यहां भी सच कुछ और निकला। 

घरों को जलाने वाले दलित और पिछड़ा जाति के लोग ही निकले। अब बात बदल गई। अब छांपो छांपो हो रहा। 

मतलब, अत्याचार की गंभीरता भी अब जाति वाद की जद में है।


खैर, नवादा में यह भी सामने आया की अभी कम से कम बिहार में मुसहर से बेवश और लाचार कोई जाति नहीं है। इनको बल दे कर उठाने की जरूरत है। पर नहीं, क्रिमिलियर के विवाद में सबसे आगे बढ़कर इसका विरोध करने वाले ही मुसहर के घरों को आग के हवाले कर दिया। 

आज वहां वेवशी है। सहानुभूति की औपचारिकता है। और राजनीति है। भला इनका होना नहीं है। 

होना रहता तो 1995 से केस चल रहा। फैसला आ गया होता।


खैर, बिहार पीछे जा रहा। अपराध बढ़े ही नही, अपराधी रेस में है। कौन किससे आगे। 

बिहार का वह जंगलराज का दौर था जब शान से कहा जाता था कि मेरे कुटुम रंगदार है। उसी दौर को लाने की सुगबुगाहट है। 

कैसे हो रहा। सबको पता है। 

इतना ही नहीं, सर्वे में जमीन मालिकों से लूट, अंचल में खुलेआम डकैती, प्री पेड बिजली मीटर से पॉकेटमारी सब कुछ हो रहा है। किसी की कोई सुनता नहीं है।

11 सितंबर 2024

जिंदाबाद आदमी है डॉक्टर कृष्ण मुरारी जी।

जिंदाबाद आदमी है डॉक्टर कृष्ण मुरारी जी।

71 वर्ष की उम्र में दूसरे जन्म का दूसरा जन्म दिन हर्षोल्लास से मनाना बहुत बड़ी है। डॉक्टर कृष्ण मुरारी जी। डॉक्टर होकर भी समाज से जुड़े रहे। समाज के होकर, समाज के साथ रहे। 
आज के दौर में बुराई तो एक ढूंढो, हजार मिलेंगे। बुराई ढूंढने वाले भी लाखों है। बस दूसरों की तरफ उठी एक उंगली पर हमारा अहंकार इतना होता है कि अपनी तरफ के तीन उंगलियों को भूल जाते है।
इसी को लेकर निदा फाजली की गजल है।

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना

यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना

मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना

पर हम अब कहां आईना रखने में विश्वास रखते है। 

खैर, बात डॉक्टर कृष्ण मुरारी जी की। कल ही जब साथ बैठे भुट्टा खा रहे थे तो हंसते हुए कहा, "मरना तो एक दिन है ही तो क्यों नहीं जी भर कर जी लें।"

जीवन के कठिन से कठिन घड़ी में इनको उदास, हताश नहीं देखा। 

कई बातें है। पर केवल एक बात। दूसरे कोरोना काल में ये शेखपुरा के सिविल सर्जन थे। इसी बीच इनका किडनी फेल हो गया। ये डायलिसिस कराते हुए अपना काम मजबूती से करते रहे। कभी पीछे नहीं हटे, डटे रहे। बोलते थे, "धुत्त, जे होतय। देखल जयतै।"

उस महामारी के पहले दौर में ही इन्होंने कहा था, "अरे यह कोई महामारी है । इसका वायरस तो साबुन से हाथ धोने से मर जाता है। डरना क्या है। हाथ धोते रहिए। सावधानी रखिए।"

फिर 68 वर्ष की उम्र में इनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। ये जरा भी नहीं डरे। पॉजिटिव सोचते रहे। आज उसी ट्रांसप्लांट की वजह से ये अपना दूसरा जन्म दिन, गोशाला में बड़े आयोजन के साथ मना रहे। जिंदादिली। जिंदाबाद है। 

इनके शतायु होने की प्रार्थना ईश्वर से करते है। 






22 अगस्त 2024

उच्चतम न्यायालय का क्रिमी लेयर, भारत बंद और अमीर गरीब का वर्ग संघर्ष

उच्चतम न्यायालय का क्रिमी लेयर, भारत बंद और अमीर गरीब का वर्ग संघर्ष 

अरुण साथी, वरिष्ठ पत्रकार 

वामपंथी पार्टियों का मूल सिद्धांत वर्ग संघर्ष का था।  अब वह भी जाति संघर्ष में बदल गई। पर सामाजिक चेतना, दबे कुचले का उत्थान, निचले पायदान के गरीबों को अगली   पंगत में खड़ा करना सभी जागरूक सामाजिक, राजनीति लोगों की महती जिम्मेवारी है।

खैर, सबसे पहले बुधवार को जो भारत बंद हुआ वह एससी, एसटी एक्ट में क्रिमीलेयर को लेकर ऊपरी तौर पर था, अंदर-अंदर अमीर हो चुके अनुसूचित जाति के लोगों ने यह बात फैलाई की उच्चतम न्यायालय और नरेंद्र मोदी के द्वारा आरक्षण खत्म करने की साजिश की जा रही है। 

दूसरी बात अनुसूचित जाति के कई जातियां जो बहुत दयनीय हालत में है, इस भारत बंद में उनकी भागीदारी कम रही। 

मेरे जिला में एकमात्र मुसहर जाति का नेता अशर्फी मांझी की माने तो इसमें मायावती और रामविलास पासवान के समर्थक जातियों के द्वारा ही मुख्य रूप से अपने गांव के आसपास पर जाम किया गया । 

केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने पटना के एक सम्मेलन में मंगलवार को ही बहुत ही साहसिक तरीके से उच्चतम न्यायालय के फैसले का समर्थन किया और राज्य सरकार से कोटा के अंदर कोटा की मांग कर दी। 

साथ ही उन्होंने ऐलान कर दिया भारत बंद में गरीब दलित शामिल नहीं होंगे। 

उन्होंने साफ कहा कि कोटा में गरीबों के लिए कोटा होना चाहिए। अमीर हो चुके दलित यह झूठ फैला रहे हैं कि आरक्षण खत्म होगा। यह वही अमीर दलित हैं , जो 95 प्रतिशत आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। 

अब सुप्रीम कोर्ट के वास्तविक फैसले पर जाने से पहले जमीन पर चलते हैं। 

मैं गांव में रहता हूं । मेरे गांव में सौ घर मुसहर, पांच घर डोम के साथ-साथ , पासी रविदास इत्यादि रहते हैं । मेरे गांव के बगल के कई गांव में पासवान जातियों की बहुलता है। 

मेरे गांव में मुसहर और डोम की पूरी की पूरी आबादी अशिक्षित है। मेरे गांव में एकमात्र रंजन मांझी की एक बेटी मैट्रिक पास करके आगे की पढ़ाई कर रही है। 

अब कुछ बच्चे स्कूल जाने लगे हैं पर केवल चार-पांच महीने ही ये बच्चे स्कूल जाएंगे। उसके बाद सभी बच्चे अपने माता-पिता के साथ 6/8 महीने के लिए पंजाब, हरियाणा, त्रिपुरा के भट्ठा पर जाकर ईंट बनाने में माता-पिता की मदद करेंगे। 

कई दलित जातियों  ज्यादातर शिक्षित हैं। कई नौकरी कर रहे हैं। कई संपन्न हुए हैं। 

मुसहर इत्यादि जातियां आज भी सरकारी जमीन पर मिट्टी की झोपड़ी में 10 लोगों का परिवार रहता है। राजनीतिक रूप से भी चेतन नहीं हैं। 

मेरे पूरे जिले में मुसहर जाति से एकमात्र अशर्फी मांझी ही नेता है। 

अब सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह क्या है। उच्चतम न्यायालय के सात सदस्य के बेंच ने 6 और 1 से अपने फैसले में एससी, एसटी को मिलने वाले आरक्षण में क्रिमीलेयर (अमीर) की पहचान कर उसके लिए कुछ कम आरक्षण और जो गरीब हैं, उसके लिए अधिक आरक्षण के प्रावधान किए जाने की बात कही है।  ऐसा केंद्र सरकार को नहीं, राज्य सरकार को करने का अधिकार दिया गया है। 

पिछड़े वर्ग और आर्थिक आधार पर जो ईडब्ल्यूएस को आरक्षण दिया गया है, उसमें भी क्रीमीलेयर की पहचान है।


भ्रम फैलाया गया  कि आरक्षण खत्म किया जाएगा। दलित की एकता तोड़ने की साजिश है, आदि इत्यादि। और इस बात को हवा दे मोदी से खुन्नस खाए तथाकथित क्रांतिजीवी यूट्यूबर पत्रकारों ने। 


एससी, एसटी एक्ट पर भी उच्चतम न्यायालय का एक फैसला आया। जिसमें कहा गया कि मुकदमा होने के पूर्व डीएसपी इसकी जांच करेंगे, इसमें कई केस झूठा हो रहा है।  पर देश में भ्रम फैलाया गया कि मोदी सरकार एससी, एसटी एक्ट को खत्म कर रही है।

आंदोलन हुआ और  दवाब में आकर  मोदी सरकार ने कोर्ट के फैसले को रोक लगाकर देश का नुकसान कर दिया।

 परिणाम भयावह है। जो पिछड़ी जाति, (यादव खास करके) इस एक्ट पर राजनीतिक कारणों से दलितों का समर्थन कर रही थी। आज 70 से 80 प्रतिशत वही पीड़ित है। 

ताजा मामला देखिए । मुजफ्फरपुर में एक गरीब दलित नाबालिग के साथ दुष्कर्म और हत्या जैसा निंदनीय और दुखद कुकर्म हुआ। पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया। वह यादव जाति का था। औरंगाबाद का एक स्वघोषित बहुजन सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष गोल्डन दास अपने सैकड़ो समर्थकों के साथ आरोपी के गांव और घर पर धावा बोल दिया। लूटपाट की। मारपीट किया। तोड़फोड़ किया। 

मतलब यह कि अभी भारत की राजनीति समानता के अधिकार से विमुख होकर असमानता को बढ़ावा दे रही है। वोट बैंक की राजनीतिक सर्वोपरि है। भोगना सभी समाज को पड़ेगा, बस।





07 अगस्त 2024

बांग्लादेश का तख्तापलट के बाद उकसाने की साजिश

बांग्लादेश का तख्तापलट के बाद उकसाने की साजिश

बांग्लादेश का तख्तापलट कट्टरपंथी, सीआईए, आईएसआई की साजिश ही है। छात्र आंदोलन का नकाब पहनाया गया। यदि नहीं तो स्वतंत्रता आंदोलन के सैनिक के परिजन को 30 प्रतिशत जो आरक्षण हाई कोर्ट ने दिया उसके नाम पर शुरू हुआ आंदोलन, सुप्रीम कोर्ट के द्वारा आरक्षण खत्म करने के फैसले के बाद खत्म हो जाता। 
खैर, अब वहां, अराजक स्थिति है। अल्पसंख्यक हिंदुओं का सरेआम कत्ल किया जा रहा। मंदिरों में आग लगाए जा रहे। 

इस सब के बाद भी तथाकथित सेकुलर मोदी विरोध के नाम पर दबी जुबान से भारत में भी इसी तरह की अराजकता के लिए मोदी विरोधी को उकसा रहे। 

यह बेहद खतरनाक बात है। कई नेता किंतु परंतु के साथ उकसाने वाली भाषा बोल रहे। कई लोग किंतु परंतु के साथ सोशल मीडिया पर लिख रहे। 

ऐसे कुंठित लोग खतरनाक इरादे रखते है। उन्हें पता होना चाहिए। भारत का आम मानस लोकतंत्र पोषक है। देश विरोधी षड्यंत्रों को नाकाम जनता करती है। देश की सत्ता को गिराने में विदेशी ताकतें कैसे काम करती है इसका उदाहरण, पाकिस्तान, श्री लंका, बंगलादेश है। यह महज बंगलादेश के बहाने भारत को घेरने की साजिश है। विश्वास है कि भारत सरकार इसे संभाल लेगी। ताकतवर को कमजोर करने के लिए साजिशें इतिहास का हिस्सा रही है। नया कुछ नहीं है।

चूंकि बंगलादेश की पीएम शेख हसीना भारत समर्थक थी, इसलिए मोदी विरोधी खुशी का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे। उन्हें यह समझना चाहिए कि मोदी हमेशा नहीं रहेंगे, देश हमेशा रहेगा।

एससी एसटी आरक्षण में क्रिमिलेयर, एससी एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा डीएसपी से जांच, सीआईए, किसान बिल, 

 किसान आंदोलन, तानाशाही प्रोगांडा, संविधान खतरे में, की आड़ में देश को जलाने का प्रयास दो बार हुआ। केंद्र ने संयम से असफल किया। मोदी को हराने में असफल लोग, देश को हराना चाहते है। यह दुर्भागपूर्ण है।

अरुण साथी